यूं मुक्ति के अनेकों अर्थ है यानी मुक्त होने के जैसे कि कर्ज से मुक्ति,मन कि चिंता से मुक्ति, ,जीवन से मुक्ति इत्यादि पर ठाकुर साहब उस थकाऊ नौकरी से मुक्ति पाना चाहते थे जहां पर समय का कोई भी हिसाब किताब नहीं था , जहां का स्टाफ के कुछ सदस्यों को इंसान से कोई भी लेना देना नहीं था उसका कारण यह था कि बे कंपनी कि तरफ से पड़ लिखे इंजीनियर थे यानी किसी के पास सिविल इंजीनियर का डिप्लोमा था या फिर डिग्री पर भले ही धरातल पर काम करने में बे सब जीरो थे पर कंपनी के अफसर उन्हें ही ज्यादा इज्जत देते थे उन्हें ही ज्यादा पावर दिए गए थे जैसे कि सुपरवाइजर फोर मेन से ज्यादा से काम लेना मजदूरों को इंसान नहीं समझना , ठेकेदार से कमिशन लेंना आदि ठाकुर साहब कंट्रक्शन कंपनी में सीनियर सुपरवाइजर थें उनका नाम नरेंद्र सिंह ठाकुर था बड़े ही सरल हृदय व दयालु थे साथ ही मेहनत कश कर्मठ, ईमानदार इसी के कारण वह मालिक लोगों के खासमखास थें उन्हें बहुत सारी जिम्मेदारी दी गई थी जैसे कि मटेरियल पर नजर रखना उसकी क्वालिटी चेक करना साइट कि अन्य व्यवस्थाएं फिर कंट्रक्शन के हर आइटम कि क्वालिटी कंट्रोल करना इत्याद...
ये काले ग़ुलाब तेरा पौधा कहां है । पत्तियां झाड़ियों में हैं कि नहीं कौन बताएगा । तेरे संघर्ष का तेरे त्याग का पुरस्कार बना परमात्म का एक लाल रंग से रंगा अनेकों पंखुड़ियों कि जतन से एक ऊपर से गाता सा इठलाता सा मुस्कुराता फूल नजर आया । ओ ग़ुलाब के फूल तुमने हां तुमने जाने कितनी बातें जाने कितनी शिकायतें हमारे हमारे मन कि सुनी जिन बातों को मेरे दोस्त भी नहीं मेरे अपने भी नहीं हमारे हम राज भी नहीं सुन सके ,पर तुमने सुनीं फिर मेरी अनगढ़ सी अटपटी सी , बातों पर शिकायतों पर विचार किया । मौन हो गम्भीर हों मुझे था समझा दिया । कहा था उनमें कहना यदि पूछें कभी कि कुछ नहीं बोला हमें देख हंसा फिर शर्मा दिया । ओ ग़ुलाब के फूल कारण बता समझायो तब बोला था जाने कितने एहसान से में दबा हूं इससे परमेश्वर से बुराई है अपने आप से लड़ाई स्वामी को चाहिए सेवक करें बड़ाई तब मैंने कहा था घबराओ नहीं हमारी उनसे बात द...