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तुम कहां हो

 तुम कहां हो? कहां नहीं हों ? दोनों अनंत काल से चले आ रहें शाश्वत प़शन है इनके उत्तर भी अनंत काल से  शाश्वत हैं। प़भु के बगैर होना तो दूर कल्पना भी संभव नहीं तुम सर्वत्र हो प़भु कण कण में समाए हों प़भु तुम यहां भी हों वहां भी हों आपके बिना कहते हैं कि  पत्ता भी नहीं हिल सकता मंद मंद शीतल पवन नहीं वह सकतीं कल कल करती नदियां नही बह सकतीं हिलोरें मारकर विशाल सागर  अपनी सीमा में नहीं रहता न ही सूर्य अपनी तपिश बिखेर कर हमें रोशनी देता न ही चांद दीए जैसी रोशनी से हमें  शीतलता देता  पूछता हूं प़भु तुम कहां हो। हे प्रभु जब से हम मानव कि अगली पीढ़ी से लेकर  आखिर पीढ़ी तक यह प़शन हमें तबाह किये हुए हैं  बर्बादी के द्वार पर खड़ा किए हुए हैं हे प्रभु प़शन अटपटा सा है पर शब्दों कि गूंज उत्तर के रूप में होती है पर परतीत नहीं होती  हे प्रभु कभी कभी लगता है कि आप हमारे अन्तर मन में हों  तब कभी कभी लगता है कि आप कण कण में हों  तब कभी कभी लगता है कि दीन हीन लाचार अपाहिज मानव  पशु पंछी कि देखभाल करने में  हमें भूल गए हों  लेकिन यह सच है कि प़भु आप तो हो  पर आप कहां हो,??
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अमावस्या और पूर्णिमा

 तारों के धूमिल प़कास में आकाश पूर्णिमा का इंतजार कर रहा था उसी समय अमावस्या आईं सदा कि भाती मुस्कुराई बोले गले में बाहें डाल मेरे कारण तुम परेशान होते रहे  मेरे अंधेरे से तुम बदनाम हो गए इससे मेरी मानो अपनी पूर्णिमा के पास चलें जायौ पर आकाश ऐक शर्त है हमारी आकाश आश्चर्य में डूबा बोला क्या पूर्णिमा के मिलते ही ऐक बार मुझे बुलाना तथा कहना उससे कि अमावस्या ने पूर्णिमा तुमसे मिलने का प्रस्ताव भेजा है। एवं कहा है कि मैं तारों कि रानी अंधियारे कि दीवानी सदियों से बहिन तुम्हारे दर्शन को ललक रहीं  कहती थी कि ऐक बार ही सहीं ज्यादा नहीं छड़ भर को मिलवाना इस विरह के इतिहास में मिलन का ऐक छड़ लिख कर तुम और पूर्णिमा जहां चाहे चलें जाना।।

अल्हड़ प्रेमका के साथ होली कविता

 तेरे सांवले सलोने गाल उन पर लाल गुलाल। गुलाबी चेहरा उलझे बाल नजरे तेरी बनाती है जाल जाने क्यों आत्मा बेचारी लिए मन कि पिचकारी सदियों से देखें राह तुम्हारी मिलन के गीतों कि है वारी । लाज संकोच कर क्या जी सकोगे अनाड़ियों कि क्या परवाह करोगे यह परवाह वे आदर्श रोकेंगे मत करो प्यार रोज कहेंगे कैसे हृदय रूपी कडाव से गंगा सी भावनाओं के रंग से । भर मन कि पिचकारी से  न मिटने वाला रंग डालू कैसे भीड़ में तुम उसी में हम है रंग कि बोछार ज्यादा गुलाब कम हैं सरोवर हो रहा पूरा मौसम है मुस्कुराने का बज रहा सरगम है। क्यों कि चाहत कि पिचकारी भरी भावनाओं से भारी तू खड़ी अपनी अटारी पर निशाना बांधने में भारी बुद्धी भारी तुम अकेले कहा महफ़िल में खड़े हों तेरे जैसे चेहरे जहां रंगे हैं खोजती नजर जहां तुम जाती हो  तब वही पीछे खड़ा पाती हों  देखती प्यार के रंग में।भीगा बदन आपका है तन से लिपट गये कपड़े योवन तुम्हारा हैं । चाहत यही तुम सदा मुस्कुराते रहो  खूब होली खेलों जी भर कर गायो यह भावना से भरी पिचकारी खाली तब होंगी इंतजार मिटेगा तब  जब सामने आप होगी ।।

बंद कमरे का पाप कहानी

अंजलि आईने के सामने खड़ी होकर अपने रूप यौवन को देखकर इतरा रही थी माथे पर आई लटों को कभी इधर करती कभी उधर कभी भोहो पर छोटे से ब्रश से कोई क़ीम लगाती तब कभी औठो पर बदल बदल कर लिपस्टिक लगाती तब कभी अपने सीने को देखकर लजाती तब कभी अपनी कटील आंखों को देखकर इधर उधर घुमाती क्यों न हो वह किसी जलपरी जैसी ही तो थी पतली कमर सुराहीदार गर्दन गुलाबी-गुलाबी गुलाब कि पंखुड़ियों जैसे होंठ, सुतवा नाक चोड़ा माथा फिर गर्दन के नीचे कमर तक लटकते हुए नागिन जैसे बाल गोरी त्वचा लम्बी छरहरी देह जब वह घर से कालेज जाने को निकलती थी तब मुहल्ले के छिछोरे लड़के उसकि स्कूटी के पीछे मोटरसाइकिल दौड़ाते कोई उसे गुलाब का फूल देकर प्यार का इजहार करता तब कोई महंगा मोबाइल फोन दिलाने का कहता तब कोई शायरी गा कर उसे लुभाने का प्रयास करता किन्तु वह किसी को भी भाव नहीं देती थी कारण वह संस्कार वान लड़की थी लेकिन कुछ दिनों से वह  लम्बी महंगी कार पर सवार खुबसूरत नौजवान कि और  आकर्षक हों रही थी हालांकि वह उसे सही तरीके से जानती भी नहीं थी बस कभी कभी कालेज के पास वाली कुल्हड़ वाली चाय कि दुकान पर उसे देखकर अनदेखा कर देती थी खैर वह श्

वो अल्हड़ निराली

 चाल निराली आली तोरी और निराली बोली तोरी कैश निराले फैलें कारे कारे चेहरे के चहुं ओर है सारे बने फिरत है धन सावन के। नयन निराले कजरारे से बड़े बड़े सीधे सादे से भोहो के धनुष बने से चलत फिरत है जब तिरछे से तीर बनें हैं और मदन के गाल निराले भरे भरे से मुस्कुराते जब गहरे गहरे से  गुस्सा में उषा बन जाते प्यार में ये संध्या बन जाते मन लुभावना है आपन के दांत निराले मुक्ता जैसे हंसते हैं जब धन बिजली से औठ लजीले लालामी लें आगंतुक कि सलामी ले सपने देखें चुप हों आवन के।।

उमरिया का अमल

 लिखना पड़ना जानना समझना याद रखना फिर उस पर अमल करना टेड़ा सवाल है हम लिख सकते हैं हम पड़ सकतें हैं समझ सकते हैं पर अमल करने वाले बात पीढ़ी दर पीढ़ी उपेक्षा कि शिकार हैं इससे क्या लिखना  क्या समझना क्या पड़ना क्या जानना क्या याद रखना सब बकवास हो गया है । उमरिया कैसे गुजरी कब और कहां से गुजरी यह तो उमरिया कि डायरिया  ही बता सकती है पर यह सच है कि उमरिया तो आधी गुजर गयी शायद आधी रह गई पर आज इस समय  इस और इसे देखने कि इसे जानने कि  हमें फुर्सत नहीं है  सब उमरिया गुजार दे रहे पर अपने मन के मकड़जाल में माया रानी के नखरों और तेवरों के  दुश्चक्र में फंसे सुन्दरता के आकर्षण में खोए ममता मोह स्नेह जैसे बेफजूल पहाड़ों जैसे घाटियों में कि ढलानों में  चढ़ते उतरते उमरिया गुजर जाती मौत आ कर सामने खड़ी हों जाती तब उमरिया साथ छोड़  आगे और आगे बड़ जाती रह जाता केवल जीव  वे इनद़ीया  जिनके सहारे अगला  सफर काटना  ऐक और फिर ऐक और उमरिया का सफर ।।

न.....ही

अरे ओ विधाता अरे ओ दाता अरे ओ मेरे जीवन के श्रेष्ठ अनमोल रत्न जरा सुन क्या कह रहा मेरा यह मन कल तेरी अचानक बगैर किसी आभास के एक अनजानी अनदेखी अनसुनी हृदय को तार तार कर झनझना देने वाली तेरी संगीत मय अति सुरेली अति पावन आवाज जो औरों कि चीख सी लगी पर तुम्हारी चीख मय न...ही मेरे मन मेरे तन मेरी आत्मा को इस प्रकार तृप्त कर दिया मानों सदियों का प्यासा पपीहा स्वाति नक्षत्र में अपनी प्यास बुझा पाया। हारा थका सा मन दिन भर का भूखा-प्यासा तन ऐसे शान्त हो गया ऐसे भर गया जैसे अब कुछ आवश्यकता ही न रही हो जाने आज पराये नव घर में तेरी उपस्थिति पा तेरा आदर देख में ऐसे भागा मैंने सब वह किया जो में नहीं कर सकता था तेरे कारण वहां लोगों ने ज्यादा जाना ज्यादा पूछा तो वो में था क्यों कि उस दिन में भूल गया था कि मैं हूं भी मुझे सिर्फ तेरा हा तेरा ही ध्यान रहा वहां सैकड़ों आए गये पर तेरे अलावा वहां कोई नहीं दिखा न जाने कितनी बातें वहां होई होंगी कितनी बातें उठी होगी पर तेरे मुखारविंद से निकली न....ही के अलावा मैने कुछ नहीं सुना जब वहां से चला तब तेरे अंतर में बसी तेरे मुख से निकली न...ही  ऐक अनजानी अनदेखी शान्

निराला प्यार

 प़भु तेरी प़ेम भरी मुस्कान से तेरी प़ेम से भरी जवान से में हृदय से धन्य हो गया चाहें जब चाहे जहां सुन्दर सुहावने स्वप्न में खो गया यदि तू नहीं होता ये तेरा स्नेह नही होता कब का हार गया होता कब का इस नश्वर संसार से मुंह मोड़ कर चला गया होता ओ प़भु यहां तो सब कुछ धोखा हैं सारे संबंधों ने जबरदस्ती  किन्हीं स्वार्थों के खातिर रोका हैं में इन सब को तेरे कारण जान गया  पहचान गया । और सिर्फ सिर्फ तुझे अन्तर मन से मान गया क्यों कि तूं ही इन सभी में यत्र तत्र आकर कभी परेशान कर  कभी संतावना दे शब्दों से तसल्ली बांधता है कभी दोस्त बन सारे जीवन  साथ देने का यकीन दिलाता है  कभी कहीं कमी नहीं तू ही जब चाहे किसी भी रूप में मिल कर मुझे मेरी राह में नित नूतन आंनद बिखेर चल देता कभी मुझे तू रोकता नहीं कभी मुझे तू टोकता नहीं  कभी मुझे तू बांधता नहीं  हमेशा स्वतंत्र रखें हैं  और हमेशा तूं हमारे लिए पलकें  बिछाए  इन्तजार करता है  में जान गया पहचान गया कि  तू और मेरी आत्मा  मेरा अन्तर मन ऐक ही है  और तू ही केवल तू ही  मुझे अनोखा प्यार करता है  तूं ही तो मेरे दुःख सुख का  अकेला साथी है  हे साथी ऐसे ही सारे जी

बांस मिरे में कुनडवा

 हाथ पांव का अभाव इन झाड़ो को हैं सता रहा अपने मिट जाने का नव भाव सता रहा तब आस्तिक हो  सबके सब प़ाथना करने लगे। प्रार्थना खाली नहीं जातीं यह सब कहने लगे आवश्यकता से जूझता उसी समय कुनडवा आया ल लहराते झाड़ो को काट काट कर मुस्कुराया भाग्यवादी पुरूषार्थ हीन नै अपने साथ झाड़ को मिटाया तभी सपूत बांस ने  कुनडवा को ललकार कर कहा बोला अब तुम मेरे करीब भटक नहीं पाओगे क्यों कि अब तुम हमें पुरूषार्थ से  विश्वास से सद्भावना से  भरे इंसान के बीच पाओगे वहां तुम्हारे जैसे छल कपट बेइमान का नामों निशान मिटा देंगे कुनडवा तुम्हारे संरक्षक तक से कह देंगे जो हम में प्रवेश कर हमारे ही साथ विश्वासघात कर चुपचाप हमारे ही दामन पर दाग लगा जातें देश में गद्दार कुल में कपूत बांस भिरे में कुनडवा पर हम क्या सभी लजा जाते ।।

प्रकृति

 दूर धुंधली धुंधली पहाड़ी उसको चूमता आलिंगन करता आसमान। कोई कहता मुझसे उस पहाड़ी पर बैठी आत्मा लगा रही तुम जैसा अनुमान। इससे एक आवाज उठती चुपचाप अपने आप से कहतीं अपनी कल्पना पर कर न लेना अभिमान सारा जग है इसी समान ये धरती ये गगन हैं महान्। सब मिलाकर बन गये मानवता के लिए सुंदर जहान। ये लहलहाते खेत और फसल गाये बिरहा कि गारी उड़ते पंछी कि कतार दूर जा कर लगती जा रही बादल के पार सामने पहाड़ पर घने सागौन महुआ के पेड़ कि कतार यह सांवला सलोना आसमान लाल कहीं नीला कहीं भूरा कही दिखता महान प्रकृति सुन्दरी को देख  अनाड़ी मन चकित रह गया वर्णन कैसे करें प़तिपल बदलते रूप का  देखता रह जाता गूंगा बना आंखें खोलें तेरी सारी प्रकृति देखा करता अंदर ही अंदर मन हसा करता अंतर्मन में प़शन उठा करता। अन्दर ही अन्दर उत्तर भी सामने नाचने लगता तेरा तो न ओर है न छोर हैं चारों दिशाओं में बस तेरा ही शोर हैं। इससे आंखें बंद कर कानों से सुना करता मन अठखेलियां कर नृत्य नाचा करता तब तेरा ही रूप अन्तर में दिखा करता।

ज़िन्दगी

 ज़िन्दगी कुछ भी नहीं है ज़िन्दगी बहुत कुछ भी हैं जिंदगी जिंदगी जो प्यार बन के मस्ती जगाती हैं। ज़िन्दगी कभी गली में  कभी डगर में कभी मुहल्ले में कभी शहर में कभी अपनों के बीच  कभी परायों के बीच चलती है  कभी नदी कि धारा कि तरह  तब कभी शांत सरोवर सी थम जाती है । जिंदगी कभी सड़कों पर  तब कभी हवाई जहाज पर  तब कभी किसी हिल स्टेशन पर  या फिर यों कहें कि कल्पना लोक में  अंतरिक्ष में सैर करती है  ज़िन्दगी कभी स्वप्न लोक में विचरण कर  मंगल ग्रह पर पहुंच जाती है  ज़िन्दगी कभी हमें चांद पर ले जाकर  उसकी उबड़-खाबड़ जमीं के दर्शन कराती है  ज़िन्दगी वह ही है जो रूखी सी सूखी सी  गीली सी आगे और आगे  बड़ने का  स्वप्न लोक से  बाहर निकल कर यर्थाथ में आकर  कुछ ऐसा करने का  जो परहित का किसी लाचार मनुष्य या फिर कोई जानवर या फिर कोई दिशा से  भटक कर कोई कलाकार  या फिर कोई अपना जैसे कि भाई  भतीजी माता पिता  के लिए काम आ जाए  उन्हें यह जिंदगी सहारा दें  तब सही अर्थों में हम जिंदगी जी रहे हैं । कहते हैं कि जिंदगी में रहना है  तब अपने आप को जिंदा दिल बना कर  आगे जाना है । इसलिए जिंदगी ऐसी जीयो कि हम हंसते हंसते ह

प्यार का दरिया कविता

 कुछ भी नहीं यहां जिसे कह दूं यह हमारा है सोचा था कभी दिल है मेरा आज वह भी तुम्हारा हैं। औरों का दिया हुआ नाम नहीं लगता यह प्यारा है। नफ़रत है मुझे उससे अंहकार का जो सहारा हैं। प़तिपल अंतर कहता  सिर्फ तू केवल तू हमारा है यह सुन यह जहां करता उपहास हमारा है।। आज से कहा सदियां से तुमने हमें तड़पाया है। रोम रोम में बस तेरा वो रूप भर समाया है। प्यार शब्दों से कैसे किया जाता है शब्दों में अक्सर झूठ भी आ जाता है प्यार तो सत्य का स्वरूप कहलाता है  प्यार तो अपने आप हो जाता है अन्तर में विकसित हो मौन कर जाता है कर्म सिर्फ कर्म करने को कह जाता है। ऐक दूसरे को देख परमानंद को पा जाता है बाकी सारे जग को परमात्मा बनाता है सारी दुश्मनी को मिटाकर प्यार आ जाता है अंहकार हीन बना नफरतों को मिटाता है मन ही मन बहुत कुछ समझा जाता है कोई करता नहीं यह सब अपने आप हो जाता है बदले में तुम्हारे ये संसार हुआ ये हमारा है। धरती मां रोज कहें तूं मेरा राज दुलारा हैं ये सागर की लहरें कहें मेरा आंचल तेरा सहारा हैं। गंगा जमना यै कहें तूं संगम का किनारा है तेरे बिना दीन हुआ दीन बंधु का प्यारा हैं तेरी दी मुस्कान कहें सारा

दर्शन अध्यात्म कविता

मन्दिर रोज जाता रोज रोज दर्शन करता दिन हो या फिर रात जब समय मिलता जितने देबी देवता दर्शन देते मे अपलक देखता आनंदित हो अपने आपको न जाने कितना सौभाग्य शाली समझा करता और आज जब मन्दिर से दूर हो गया तो दिन भर रात भर ऐक रट रहा करती कि किसी तरह एक पल के लिए दर्शन हो जाए पहुंचता हूं  दूर से मन्दिर देख मन में और तन में  अपार हर्ष छा जाता फिर खोजता आराध्य को मिल जाते दिख जाते तब मैं सारा विषाद सारा थका देने वाला इंतजार भूल ऐक मीठा मीठा आंनद का अनुभव करता और कभी कभी मेरे पहुंचते ही जब मन्दिर के कपाट पुजारी नहीं देवता बंद कर देते तब मेरा क्या होता मुझे क्या मिलता ऐक अनजानी आशा अनजाना विश्वास अनजानी नफरत अनजानी तड़पन जो सब मिलाकर उनका रूप अंदर मुसकुरा मुसकुरा अजीब आंनद को गद गद कर देता है  आत्मा चुपचाप कहती  बाहर कहां दर्शन करने जाते हो  हम तो तुम्हारे अंदर हैं  हम ही परमात्मा के अंश प़तिबंम हैं  इसलिए मेरी मानो अच्छा सोचो  अच्छे-अच्छे कर्म करो  फिर देखना आत्मा के अन्दर ही तुम्हें परमात्मा के दर्शन हो जाएंगे।

आत्म दर्शन कविता

 तुम सुनो हम सुनें उसे भी सुनाये सुन सुन कर हम गहरे और गहरे में जाए उतरे अपने आप में झांके अपने आप में सुने अपने आप कि शायद वह सुनना सबसे कठीन साबित हो जैसे पक्की सड़क से घाटियों पहाड़ीयों के उबड़-खाबड़ कांटों कंकड़-पत्थर से भरा रास्ता हो पर देखें अपने आप को छोड़ो भीड़ भाड़ अपने पराए भेदभाव भूल दूर कहीं एकान्त में एकला चलो और सुनोगे अपने आप उठते संगीत को अपने आप में जीवित शास्वत आंनद को सुनो बृहं नंद रूपी सरिता कि कल कल कि मनोहर आबाज में डुब जायो मोन हो जायो विलीन हो जाओ और अपने अंह को खो दो  विसर्जन कर दो  अपने आपको सुनने में 

पहचान कविता

 सूर्य दिशा कि पहचान क्या  सूर्य उदय से है सूरज नहीं निकलता नहीं आता चांद का ही राज रहता तब क्या सूर्य दिशा कि पहचान नहीं हो पाती। प्रश्न है यह  तुम्हारे अतीत से तुम्हारे वर्तमान से तुम्हारे भविष्य से क्यों कि इसका उत्तर सर्वत्र फूलों में हैं फूलों का पराग लेते भंवरों से है कल कल बहती नदी ऐक असान लगा समाधि में बैठे पहाड़ पर है सर सर बहती हबा धक धक जलती अग्नि तारों के साथ खेलता कूदता चांद चांद के साथ आंख मिचौली खेलता आकाश नदियों कि राहें बनाने वाली पर्वत को पेड़े को हमको तुमको जो हैं सभी को अपनी छाती से चिपकाने वाली चुपचाप फूलों के बागों कि बहारों से हर्षित होने वाली वह धरती मां यह सब साछी है हमारे प्रश्न के भी उत्तर के भी  साछी यही होंगे।