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Showing posts from May, 2023

मजबूर संध्या

 संध्या आ गई पर आज सुहागिन नहीं है आज उसके चेहरे पर मुस्कान भरी लालिमा नहीं है  आज तो इन अभिमानी बादलों ने  तूफान और मेघों को न्योता देकर बुला लिया  संध्या बेचारी को मेहमानों के स्वागत में लगा दिया  उसे आज श्रंगार नहीं करनें दिया  उसे अपने प्रीतम सूरज से नहीं मिलने दिया  पिया बगैर श्रंगार वह कर भी लें  वह सम्मान स्नेह नही पाती  उसके प्रीतम के इन्तजार में अपने मकान मालिक बादल के इशारे पर जी जान से लगी रही  वह सोचती रही अगर इनकी नहीं मानूंगी तब  यह इन दुश्मनों को भी यही रखेंगे  और हम जैसी सुहागिनों को  जानें किन किन घर  संदेहों के बीच अर्ध के अभाव में  आवास के चाव में  अपने अपने प्रीतम से दूर करेंगे ।

मेरा गांव कविता

 मेरे गांव तुम जब आओगे तब वस गांव को देखते रह जाओगे फिर तुम्हें गांव से लगे पहाड़ पर लें चलुंगा वहां से दिखाई देंगे हरे भरे खेत सामने कल कल करती वहती नदी  दूसरी ओर भरा सरोवर  हमारे गांव के छोटे छोटे कच्चे पक्के घर  उनके आस पास घूमते फटे कपड़े में घूमते  मेहनत कश नर  सुबह जब आप हमारे साथ घूमने जाओगे  तब उषा कि लाली  दिल खोलकर आप का स्वागत करेगी गांव की गरीबी कबाड़ पिछड़ा पन अ शिक्षा तुमसे सवाल करेगी  दिन रात श्रम को समर्पित फिर भी अभावों के बीच गुजरती जिदंगी  तुम्हें सोचने को बाध्य करेगी ।

तारों का उदय

 ऐक तरैया पापी देखें दो देखें चांडाल तीन तरैया राजा देखें  फिर देखें संसार सांझ के वक्त में रोज  ऐक तरैया देख  पापी बनने का सौभाग्य पल भर को सही कर पाता हूं । जल्दी ही नज़र घुमा कर  दूसरी तीसरी कि तलाश  शुरू कर देता हूं । मन चाहता है कि दो तारें  ऐक साथ नज़र आए  तब चांडाल होने से  बच जाए  पर चांडाल भी रोज बनना पड़ता  अपने आप को ही अछूत  समझना पड़ता । फिर विचार आता मन अकुलाता तीसरी तरैया को देखने  सारे आसमां में नजर घुमाता  लेकिन वह तारा नजर नहीं आता  में चांडाल बना रहता  न जाने क्यों रास नहीं आता तभी तीसरी तरैया  नजर आ जाती  राजा बनने कि अस्पष्ट रेखा अधर पर छा जाती  कोई पास होता तब उसे या अपने को  मेरे राजा बनने कि कहानी बतलाती कहती तीन तरैया राजा देखें फिर देखें संसार  तभी कहें सुनने वाला  जरा ऐक नजर आसमां पर डालो  फिर इठलाना कि तुम राजा बाकि सब संसार  ऊपर नजर डाली तब अनगिनत तारें नज़र आए  राजा मिटा फिर अनन्त के बीच खड़ा कर  अंहकार हीन सभ्य नागरिक बनातीं...

चित्रकार कविता

 तुम चित्रकार हों कोई कहता तुम कलाकार हो कोई कहता तुम अदाकार हो कोई कहता तुम संसार का सार हो में तो तुम्हें चित्रकार जानता  इसी से अपना मानता इसी से में तुमसे नहीं डरता  चाहें जब तुम्हारे ही पीछे पड़ा रहता देखता हूं कि तू अप भीनी करूणा  दोनों में बहाता हैं  उनको मुस्कुराते देख खूब मुस्कुराता हैं  अपना चित्र उनके हृदय में बसा देता  उसके चित्र तू दिल में छिपा लेता ।। तुम चित्रकार हों चित्र वना बना  चितेरे हों गया हो  न चाने कितने चित लूट  चिन्त के लुटेरे हों गये हों  पर हों निराले  क्यों कि कला के बदलें  धन नहीं लेते  मन के आशिक प्रेमी भिखारी वन  तन मन मांग लेते  जो देता उसे भेंट में अपना चित्र दे देते  कभी कभी चित्र के साथ तुम खुद चल देते  परवाह नहीं करते अपनी हैसियत का  सब कुछ लुटा देते  पर हम अभागे अपना मन भी नहीं देते ।।। तुम चित्रकार हों  इससे रात दिन  अपने कर्म में लगे रहते  चित्र वना बना कला कि पूजा करतें  सालों रहते पास पर मोन ही बने रहते  आंखों ही आंखों में...