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तुम कहां हो

 तुम कहां हो? कहां नहीं हों ? दोनों अनंत काल से चले आ रहें शाश्वत प़शन है इनके उत्तर भी अनंत काल से  शाश्वत हैं। प़भु के बगैर होना तो दूर कल्पना भी संभव नहीं तुम सर्वत्र हो प़भु कण कण में समाए हों प़भु तुम यहां भी हों वहां भी हों आपके बिना कहते हैं कि  पत्ता भी नहीं हिल सकता मंद मंद शीतल पवन नहीं वह सकतीं कल कल करती नदियां नही बह सकतीं हिलोरें मारकर विशाल सागर  अपनी सीमा में नहीं रहता न ही सूर्य अपनी तपिश बिखेर कर हमें रोशनी देता न ही चांद दीए जैसी रोशनी से हमें  शीतलता देता  पूछता हूं प़भु तुम कहां हो। हे प्रभु जब से हम मानव कि अगली पीढ़ी से लेकर  आखिर पीढ़ी तक यह प़शन हमें तबाह किये हुए हैं  बर्बादी के द्वार पर खड़ा किए हुए हैं हे प्रभु प़शन अटपटा सा है पर शब्दों कि गूंज उत्तर के रूप में होती है पर परतीत नहीं होती  हे प्रभु कभी कभी लगता है कि आप हमारे अन्तर मन में हों  तब कभी कभी लगता है कि आप कण कण में हों  तब कभी कभी लगता है कि दीन हीन लाचार अपाहिज मानव  पशु पंछी कि देखभाल करने में  हमें भूल गए हों  लेकिन यह सच है कि प़भु आप तो हो  पर आप कहां हो,??

म्र सत्तर कि नखरे बचपन के "परिवार कि कहानी

रमा नाश्ता तैयार कर रही थी तभी आवाज आई बहू ओ बहू तूने चाय में शक्कर  नहीं डाली पता नहीं कहां रहता है दिमाग कुछ देर बाद बहू तूने पानी गर्म किया या नहीं फिर कुछ देर बाद अरे ओ बहु मेरे लिए पालक पराठा वना देना ऐसे ही उसकि सास उसे आदेश देते रहती थी वह उनके हर आदेश का पालन करती थी । ऐतवार का दिन था पति सुबोध छुट्टी होने के कारण बच्चों के साथ कैरम बोर्ड पर गोटियां खेल रहे थे चूंकि वह दोनों बच्चों सहित तीन ही हों रहें थें चौथा खिलाड़ी कम हों रहा था तभी तों बेटी सुचित्रा ने आवाज देकर मम्मी आप भी आ जाइए न उसकी बात खत्म भी नहीं हुई थी तभी बेटा गोलू ने कहा मम्मी आ जाइए न देखो दीदी मेरे साथ चिटिंग कर रही है मुझे बार बार हरा रहीं हैं रमा ने किचन से आवाज देकर जवाब दिया न बाबा न मुझे बहुत काम करना हैं उसके मना करने पर पति सुबोध ने अरे भाई आ जाइए न बच्चे जिद कर रहें हैं काम तो बाद में होता रहेगा पति के कहते ही रमा कमर में साड़ी का पल्लू खोंसकर कैरम खेलने लगी थी बाजी खत्म भी नहीं हो पाई थी तभी अम्मा जी ने बेडरूम से लेटे लेटे आवाज लगाई बहू ओ बहू बात कि बाम लाकर मेरे घुटनों में मालिश कर देना वह खेल छोड़कर