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दिसंबर, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

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तुम कहां हो

 तुम कहां हो? कहां नहीं हों ? दोनों अनंत काल से चले आ रहें शाश्वत प़शन है इनके उत्तर भी अनंत काल से  शाश्वत हैं। प़भु के बगैर होना तो दूर कल्पना भी संभव नहीं तुम सर्वत्र हो प़भु कण कण में समाए हों प़भु तुम यहां भी हों वहां भी हों आपके बिना कहते हैं कि  पत्ता भी नहीं हिल सकता मंद मंद शीतल पवन नहीं वह सकतीं कल कल करती नदियां नही बह सकतीं हिलोरें मारकर विशाल सागर  अपनी सीमा में नहीं रहता न ही सूर्य अपनी तपिश बिखेर कर हमें रोशनी देता न ही चांद दीए जैसी रोशनी से हमें  शीतलता देता  पूछता हूं प़भु तुम कहां हो। हे प्रभु जब से हम मानव कि अगली पीढ़ी से लेकर  आखिर पीढ़ी तक यह प़शन हमें तबाह किये हुए हैं  बर्बादी के द्वार पर खड़ा किए हुए हैं हे प्रभु प़शन अटपटा सा है पर शब्दों कि गूंज उत्तर के रूप में होती है पर परतीत नहीं होती  हे प्रभु कभी कभी लगता है कि आप हमारे अन्तर मन में हों  तब कभी कभी लगता है कि आप कण कण में हों  तब कभी कभी लगता है कि दीन हीन लाचार अपाहिज मानव  पशु पंछी कि देखभाल करने में  हमें भूल गए हों  लेकिन यह सच है कि प़भु आप तो हो  पर आप कहां हो,??

बंद कमरे का पाप कहानी

अंजलि आईने के सामने खड़ी होकर अपने रूप यौवन को देखकर इतरा रही थी माथे पर आई लटों को कभी इधर करती कभी उधर कभी भोहो पर छोटे से ब्रश से कोई क़ीम लगाती तब कभी औठो पर बदल बदल कर लिपस्टिक लगाती तब कभी अपने सीने को देखकर लजाती तब कभी अपनी कटील आंखों को देखकर इधर उधर घुमाती क्यों न हो वह किसी जलपरी जैसी ही तो थी पतली कमर सुराहीदार गर्दन गुलाबी-गुलाबी गुलाब कि पंखुड़ियों जैसे होंठ, सुतवा नाक चोड़ा माथा फिर गर्दन के नीचे कमर तक लटकते हुए नागिन जैसे बाल गोरी त्वचा लम्बी छरहरी देह जब वह घर से कालेज जाने को निकलती थी तब मुहल्ले के छिछोरे लड़के उसकि स्कूटी के पीछे मोटरसाइकिल दौड़ाते कोई उसे गुलाब का फूल देकर प्यार का इजहार करता तब कोई महंगा मोबाइल फोन दिलाने का कहता तब कोई शायरी गा कर उसे लुभाने का प्रयास करता किन्तु वह किसी को भी भाव नहीं देती थी कारण वह संस्कार वान लड़की थी लेकिन कुछ दिनों से वह  लम्बी महंगी कार पर सवार खुबसूरत नौजवान कि और  आकर्षक हों रही थी हालांकि वह उसे सही तरीके से जानती भी नहीं थी बस कभी कभी कालेज के पास वाली कुल्हड़ वाली चाय कि दुकान पर उसे देखकर अनदेखा कर देती थी खैर वह श्

वो अल्हड़ निराली

 चाल निराली आली तोरी और निराली बोली तोरी कैश निराले फैलें कारे कारे चेहरे के चहुं ओर है सारे बने फिरत है धन सावन के। नयन निराले कजरारे से बड़े बड़े सीधे सादे से भोहो के धनुष बने से चलत फिरत है जब तिरछे से तीर बनें हैं और मदन के गाल निराले भरे भरे से मुस्कुराते जब गहरे गहरे से  गुस्सा में उषा बन जाते प्यार में ये संध्या बन जाते मन लुभावना है आपन के दांत निराले मुक्ता जैसे हंसते हैं जब धन बिजली से औठ लजीले लालामी लें आगंतुक कि सलामी ले सपने देखें चुप हों आवन के।।

उमरिया का अमल

 लिखना पड़ना जानना समझना याद रखना फिर उस पर अमल करना टेड़ा सवाल है हम लिख सकते हैं हम पड़ सकतें हैं समझ सकते हैं पर अमल करने वाले बात पीढ़ी दर पीढ़ी उपेक्षा कि शिकार हैं इससे क्या लिखना  क्या समझना क्या पड़ना क्या जानना क्या याद रखना सब बकवास हो गया है । उमरिया कैसे गुजरी कब और कहां से गुजरी यह तो उमरिया कि डायरिया  ही बता सकती है पर यह सच है कि उमरिया तो आधी गुजर गयी शायद आधी रह गई पर आज इस समय  इस और इसे देखने कि इसे जानने कि  हमें फुर्सत नहीं है  सब उमरिया गुजार दे रहे पर अपने मन के मकड़जाल में माया रानी के नखरों और तेवरों के  दुश्चक्र में फंसे सुन्दरता के आकर्षण में खोए ममता मोह स्नेह जैसे बेफजूल पहाड़ों जैसे घाटियों में कि ढलानों में  चढ़ते उतरते उमरिया गुजर जाती मौत आ कर सामने खड़ी हों जाती तब उमरिया साथ छोड़  आगे और आगे बड़ जाती रह जाता केवल जीव  वे इनद़ीया  जिनके सहारे अगला  सफर काटना  ऐक और फिर ऐक और उमरिया का सफर ।।