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Showing posts from March, 2022

लॉकडाउन

 घर बंदी के पहली कोरोनावायरस कि लहर को आज भी भूला नहीं पा रहा हूं शायद यह मानव इतिहास का पहला घर जैल था हालांकि हम मानवों ने अपने निजी हितों के लिए जल जंगल जमीन का दोहन किया जमीन के अंदर से गैस खनिज पदार्थ डीजल पेट्रोल कोयला निकाला, समुद्र के पानी को रीसाइक्लिंग मशीन से अपने पीने के लिए तैयार किया , जंगल के हरे भरे लहलहाते पेड़ों को काटकर अपने लिए फर्नीचर सोफ़ा सेट या फिर घर के लिए दरवाजे खिड़कियां या फिर औषधि के लिए इनका उपयोग किया पहाड़ को काटकर हमने सड़क मार्ग के लिए  घर के भराव के लिए ,या फिर किसी सीमेंट फैक्ट्री , साबुन वगैरह के लिए पथरीली चट्टान को काटकर उसका चूर्ण बनाकर उपयोग किया , जिससे पहाड़ लगभग खत्म होने के कगार पर है , हमारे स्वार्थ ने जंगली जानवर जीवों को भूखों रहने के लिए मोहताज कर दिया यही कारण है कि हाथी ,शेर,चीता , तेंदुआ, भालू,बाघ,कभी कभी अपनी सीमा लांघ कर इंसानी बस्तीयों में आ कर इंसान पर आक्रमण कर रहे हैं क्या हम इसमें दोशी नहीं है ??् दूसरी ओर हमने अपने अपने देश कि सीमा कि रक्षा के लिए घातक हथियारों का अविष्कार किया जैसे कि जैविक, रसायनिक आदि जो कि पल भर ...

गुलाब का फूल काव्य संग्रह

 ओ गुलाब तुम रह गये  कि में तुम्हें छोड़ आया  यहां बहुत खोजा तुम्हें  पर तुम नहीं मिले तो बहुत पछताया । मैंने सोचा चलो तुम्हारे  अन्य साथियों से मिल कर बात करूं  फूल तुम किसी दूसरे फूल से  तुम्हारी शिकायत करूं  पर यहां न गैंदा न चमेली  न जुटी कोइ भी नजर  नहीं आएं  तब तुम्हारे अभाव में  हम थे घबड़ाया हम चारों तरफ भटक आएं  सरोवर तक गये  पर सरोज भी न नजर आएं  जंगल भी भटके पर  तुम्हारे जैसा कोई नजर नहीं आया  तब मेरी पसंद सुन  मेरा दोस्त भी मुस्कुराता हुआ  बोला कि गुलाब  को तुम इस इलाके में  खिलाओगे  वे शर्म के प्रेमियों को  क्या जीते जी जलाओगे  मेने कहा था वह भी कोई फूल हैं  दोस्त बोला तुम नहीं मानो  पर इस इलाके के लिए  वही अनुकूल है । मेने कहा क्यों  जरा स्पष्ट बताओगे  दोस्त बोला बगैर गमला  बगैर पानी दिए बगैर रखाए  बेसरम चाहे जहां उगाओ  पर मैंने कहां  पर बेसरम का फूल पूजा में शामिल  नहीं होता  दोस्त बोला न जाएं  ...

काला गुलाब अध्यात्म से जोड़ता काव्य संग्रह भाग चार

 ओ मेरे काले ग़ुलाब आज मैं पा गया वह वरदान  जिसकी चर्चा में तुझ से  काफी दिनों से करता था  रोज तेरे सामने  जन्मदाता के सामने कहता था और तू भी तो यही चाहता था  इससे तेरी शुभकामनाएं ही  हमें हमारी मंजिल कि  ओर बड़ा रही  और तू बिछड़ने कि सुन  मुस्कुराता नजर आता है । ओ काले ग़ुलाब  तू कभी कभी  महावीर स्वामी का  सार्थक उपदेश  जैसे कि वर्तमान में ही  खुश रहो  भविष्य कि चिंता मत कर  दुःख सुख को एक मानों  मौत से मत डरो  आत्मा अमर है अजर है  उसे कौन मार सकता है  कौन काट सकता है  कोन जला सकता है  यह तो छोर हैं  जीवन का  इससे ढाल से टूटने के  बाद भी तू अनेकों दिन  माली व्यापारी कि ठोकनी  में भी तू मुस्कुराता नजर आता है । ओ मेरे काले गुलाब तुझे ले  हृदय से भावनाओं के सागर में ज्वार भाटा  सा आ रहा है  लगता है तू  विशाल महासागर है  जिसकि गहराइयों को  विज्ञान भी  नहीं नाप पाया  इसलिए तू तो मुझे  प्रसन्नता बन  मानवत...

काला गुलाब अध्यात्म से जोड़ता काव्य संग्रह भाग चार

 ओ मेरे काले ग़ुलाब आज मैं पा गया वह वरदान  जिसकी चर्चा में तुझ से  काफी दिनों से करता था  रोज तेरे सामने  जन्मदाता के सामने कहता था और तू भी तो यही चाहता था  इससे तेरी शुभकामनाएं ही  हमें हमारी मंजिल कि  ओर बड़ा रही  और तू बिछड़ने कि सुन  मुस्कुराता नजर आता है । ओ काले ग़ुलाब  तू कभी कभी  महावीर स्वामी का  सार्थक उपदेश  जैसे कि वर्तमान में ही  खुश रहो  भविष्य कि चिंता मत कर  दुःख सुख को एक मानों  मौत से मत डरो  आत्मा अमर है अजर है  उसे कौन मार सकता है  कौन काट सकता है  कोन जला सकता है  यह तो छोर हैं  जीवन का  इससे ढाल से टूटने के  बाद भी तू अनेकों दिन  माली व्यापारी कि ठोकनी  में भी तू मुस्कुराता नजर आता है । ओ मेरे काले गुलाब तुझे ले  हृदय से भावनाओं के सागर में ज्वार भाटा  सा आ रहा है  लगता है तू  विशाल महासागर है  जिसकि गहराइयों को  विज्ञान भी  नहीं नाप पाया  इसलिए तू तो मुझे  प्रसन्नता बन  मानवत...

काला गुलाब भाग तीन

 ओ मेरे आत्मिय गुलाब  आपकों संसार के सामने  रखने का फैसला कर चुका हूं  गुलाब तो सभी ने देखा है   के  गुलाबों के बीच  शान से आन से  सम्मान  से खड़े हो  मानवता के प्रति एसा  कह जाओगे  शायद हमें भी  मानव के बीच  कहीं भी हंसाओ गे । ओ काले ग़ुलाब तू सात समंदर पार  करता राजधानी छोड़ता  महानगर व नगर कि सीमाएं  लांघता  अपने सुंदर रूप को छिपाता  चाहे जहां हंसता  इठलाता गांव में  दीन हीन के झोंपड़े में  सामने धूल धुसरित  आंगन में   विकसित हो  खिला नजर आता । ओ काले ग़ुलाब  तुझे भी  कलाकारों कि आराध्या सरस्वती मां के  चरणों पर चढ़ने का । समर्पित होने का सौभाग्य मिला है इससे तू रोज़  उनकि सेवा को  तैयार रहने का  उनकि सेवा को तत्पर रहने का  उनकि चरणों की शोभा बनने  का इशारा सा करता  नजर आता है । ओ सांवले सलोने गुलाब  जिस दिन जिस समय  तू पहली बार  मेरी नजरों के  सामने आया तब रोमांच  हो अनजाने आंनद से...

काला गुलाब भाग तीन

 ओ मेरे आत्मिय गुलाब  आपकों संसार के सामने  रखने का फैसला कर चुका हूं  गुलाब तो सभी ने देखा है   के  गुलाबों के बीच  शान से आन से  सम्मान  से खड़े हो  मानवता के प्रति एसा  कह जाओगे  शायद हमें भी  मानव के बीच  कहीं भी हंसाओ गे । ओ काले ग़ुलाब तू सात समंदर पार  करता राजधानी छोड़ता  महानगर व नगर कि सीमाएं  लांघता  अपने सुंदर रूप को छिपाता  चाहे जहां हंसता  इठलाता गांव में  दीन हीन के झोंपड़े में  सामने धूल धुसरित  आंगन में   विकसित हो  खिला नजर आता । ओ काले ग़ुलाब  तुझे भी  कलाकारों कि आराध्या सरस्वती मां के  चरणों पर चढ़ने का । समर्पित होने का सौभाग्य मिला है इससे तू रोज़  उनकि सेवा को  तैयार रहने का  उनकि सेवा को तत्पर रहने का  उनकि चरणों की शोभा बनने  का इशारा सा करता  नजर आता है । ओ सांवले सलोने गुलाब  जिस दिन जिस समय  तू पहली बार  मेरी नजरों के  सामने आया तब रोमांच  हो अनजाने आंनद से...

" काला गुलाब "भाग एक

ये काले ग़ुलाब   तेरा पौधा कहां है । पत्तियां झाड़ियों में हैं  कि नहीं कौन बताएगा । तेरे संघर्ष का तेरे त्याग का पुरस्कार बना परमात्म का एक लाल रंग से रंगा  अनेकों पंखुड़ियों कि जतन से  एक ऊपर से  गाता सा  इठलाता सा  मुस्कुराता फूल नजर आया । ओ ग़ुलाब के फूल  तुमने हां तुमने  जाने कितनी बातें  जाने कितनी शिकायतें  हमारे हमारे मन कि सुनी  जिन बातों को मेरे दोस्त भी नहीं  मेरे अपने भी नहीं  हमारे हम राज भी नहीं  सुन सके ,पर तुमने सुनीं  फिर मेरी अनगढ़ सी  अटपटी सी , बातों पर  शिकायतों पर विचार किया । मौन हो गम्भीर हों  मुझे था समझा दिया । कहा था उनमें कहना  यदि पूछें कभी   कि कुछ नहीं बोला  हमें देख हंसा  फिर शर्मा दिया । ओ ग़ुलाब के फूल कारण बता समझायो  तब बोला था  जाने कितने एहसान  से में दबा हूं इससे परमेश्वर से बुराई है  अपने आप से लड़ाई  स्वामी को चाहिए  सेवक करें बड़ाई  तब मैंने कहा था  घबराओ नहीं  हमारी उनसे बात  द...

काला गुलाब भाग एक

ये काले ग़ुलाब   तेरा पौधा कहां है । पत्तियां झाड़ियों में हैं  कि नहीं कौन बताएगा । तेरे संघर्ष का तेरे त्याग का पुरस्कार बना परमात्म का एक लाल रंग से रंगा  अनेकों पंखुड़ियों कि जतन से  एक ऊपर से  गाता सा  इठलाता सा  मुस्कुराता फूल नजर आया । ओ ग़ुलाब के फूल  तुमने हां तुमने  जाने कितनी बातें  जाने कितनी शिकायतें  हमारे हमारे मन कि सुनी  जिन बातों को मेरे दोस्त भी नहीं  मेरे अपने भी नहीं  हमारे हम राज भी नहीं  सुन सके ,पर तुमने सुनीं  फिर मेरी अनगढ़ सी  अटपटी सी , बातों पर  शिकायतों पर विचार किया । मौन हो गम्भीर हों  मुझे था समझा दिया । कहा था उनमें कहना  यदि पूछें कभी   कि कुछ नहीं बोला  हमें देख हंसा  फिर शर्मा दिया । ओ ग़ुलाब के फूल कारण बता समझायो  तब बोला था  जाने कितने एहसान  से में दबा हूं इससे परमेश्वर से बुराई है  अपने आप से लड़ाई  स्वामी को चाहिए  सेवक करें बड़ाई  तब मैंने कहा था  घबराओ नहीं  हमारी उनसे बात  द...

लालच बुरी बला पति पत्नी की कहानी

नाथ पेशे से सिविल  इंजीनियर थे हालांकि सिविल इंजीनियरिंग से एम् टेक करने के बाद  उन्होंने सरकारी नौकरी  के लिए अनेकों बार फार्म भरकर परीक्षा दी थी पर हर बार कुछ अंकों से उत्तीर्ण नहीं हो पाए थे कारण आरक्षण था फिर थक हार कर उन्होंने प्राइवेट सेक्टर को अपना जीवन यापन हेतु चयनित किया था  कठोर परिश्रम के साथ  कंपनी  का क्वांटिटी व क्वालिटी का ध्यान रखा था  उच्च अधिकारीयों ने उन्हें जल्दी ही तरक्की पर तरक्की दे कर प्रोजेक्ट मैनेजर के पद पर आसीन कर दिया था।सब कुछ अच्छा चल रहा था पर कलमुंही महामारी ने एक ही झटके से तहस नहस कर दिया था ।  चूंकि महामारी ने मां बाप को भी चपेट में ले लिया था ह उनके इलाज पर वहुत खर्च हो गया था फिर भी यमराज के दूत उनके प्राण ले गए थे , फिर अपने  परिवार का सारा भरण पोषण उनके कंधे पर था जैसे कि  घरेलू खर्च ,  लाइफ इंश्योरेंस कि फीस ,कार कि इ एम आई ,घर कि भी एम आई , आदि कर्ज पर कर्ज  एसे में एकाएक वे रोजगार होना   समझने वाले ही समझ सकते हैं ऐसी ही मुश्किल परिस्थितियों में घिर गए थें बाबू मुक्ति नाथ ! ...

कंटीली राहें काका कि आत्म कथा भाग 02

  पिछले भाग से आगे  बारहवीं का रिजल्ट घोषित5" गया था कलमकार के साथ के लड़के अच्छी डीबिजन से पास हुए थे वहीं वह सैकंड ग्रेड से पास हुआ था उसके रिजल्ट के परिणाम से पूरा परिवार परेशान था दादा ताने पर ताने दे रहे थे फिर उन्होंने मन ही मन विचार किया था लड़का रोज़ साइकिल से पच्चीस किलोमीटर दूर आता जाता है थक जाता होगा क्यों न शहर में ही मकान किराए पर दिला दूं आने जाने का समय का सदुपयोग पड़ने में हों जाएगा फिर क्या था जल्दी ही कमरा किराए से ले लिया गया था उसके अन्दर स्टोव वर्तन बिस्तर खटिया राशन पानी जमा कर दिया गया था अब कलमकार को अकेला छोड़ दिया गया था वह अपने हाथ से खाना पकाता कपड़े धोता था फिर पढ़ाई करता था हां अब वह लाइब्रेरी का सदस्य बन गया था जहां पर विश्व साहित्य कि अनेकों पुस्तकें जमा थीं उन्हें पड़ता विचार कर्ता चिंतन करता उसकि दिनचर्या बदल गयी थी उसका व्यवहार बदल गया था कालेज में सहपाठी के बीच सबसे होनहार कहलाने लगा था वह कालेज में हर प्रकार के कंपटीशन में भाग लेता था जैसे कि लेख , वाद-विवाद प्रतियोगिता , खेलकूद आदि यूं फुटबॉल का अच्छा खिलाड़ी बन गया था उसका सिलेक्शन प्रदे...

कलमकार कि आत्म कथा

  पिछले भाग से आगे  बारहवीं का रिजल्ट घोषित5" गया था कलमकार के साथ के लड़के अच्छी डीबिजन से पास हुए थे वहीं वह सैकंड ग्रेड से पास हुआ था उसके रिजल्ट के परिणाम से पूरा परिवार परेशान था दादा ताने पर ताने दे रहे थे फिर उन्होंने मन ही मन विचार किया था लड़का रोज़ साइकिल से पच्चीस किलोमीटर दूर आता जाता है थक जाता होगा क्यों न शहर में ही मकान किराए पर दिला दूं आने जाने का समय का सदुपयोग पड़ने में हों जाएगा फिर क्या था जल्दी ही कमरा किराए से ले लिया गया था उसके अन्दर स्टोव वर्तन बिस्तर खटिया राशन पानी जमा कर दिया गया था अब कलमकार को अकेला छोड़ दिया गया था वह अपने हाथ से खाना पकाता कपड़े धोता था फिर पढ़ाई करता था हां अब वह लाइब्रेरी का सदस्य बन गया था जहां पर विश्व साहित्य कि अनेकों पुस्तकें जमा थीं उन्हें पड़ता विचार कर्ता चिंतन करता उसकि दिनचर्या बदल गयी थी उसका व्यवहार बदल गया था कालेज में सहपाठी के बीच सबसे होनहार कहलाने लगा था वह कालेज में हर प्रकार के कंपटीशन में भाग लेता था जैसे कि लेख , वाद-विवाद प्रतियोगिता , खेलकूद आदि यूं फुटबॉल का अच्छा खिलाड़ी बन गया था उसका सिलेक्शन प्रदे...

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दो गज कि दूरी

यूं  सेठ लछमी चंद को रूपयों पैसे कि कोई भी तंगी नहीं थी भगवान का दिया हुआ सब कुछ था दर्जनों  कारे  बंगले थे हजारों  करोड़ रुपए कि (रियल एस्टेट) कम्पनी के मालिक थे  अनेकों शहरों में व्यापार फैला था सेकंडों नोकर चाकर थे पावर इतना कि बढ़े बढ़े मंत्री चाय पीने को आते थे उच्च पदों पर बैठे सरकारी मुलाजिमों से अच्छा यराना था ऐक फ़ोन पर फाइलों में साइन करा लेने का अधिकार रखते थे वो बात अलग थी कि सेठ समय समय पर अपनी यारी नोटों के बंडल भेंट रूप में देकर निभाते रहते थे  खैर पैसे से कैसे पैसे बनाए जाते थे उन्हें हर गुर बखूबी आता था सेठ जी कि उम्र लगभग साठ साल के आसपास कनपटी पर सफेद बाल थुलथुल शरीर गोरे चिट्टे मध्यम कद चेहरे पर तेज पर शरीर में बहुत सारी बिमारियों ने बसेरा कर रखा था जैसे शुगर ब्लेड प्रेशर गैस आदि आदि फिर भी दिन भर भागदौड़ कर रात्रि  दो बजे तक हिसाब किताब में ऊलछे रहते थे यू तो एकाउंट को सम्हालने वाले सी ऐ भी थे पर उनके ही हिसाब किताब को चेक करते थे विश्वास अपने रोम पर भी नहीं था  अर्धांगिनी कभी कभी टोकती तब यू कहकर टरका देते कि बस अब आख़री साल ...

लोक कथा सामाजिक कहानी

             ऐक था राजा उसका ऐक राजकुमार था राज्य में सब कूशल मंगल था ऐक दिन राजा राजकुमार को राज सौंप कर तीर्थ यात्रा को निकल गया राजा के जाने के बाद राजकुमार अपनी सूझबूझ से राज्य चलाने लगा था चारो ओर शांति समृद्धि कायम हो रही थी जो कुछ चाटूकारों को अच्छी नही लगती थी  ऐक दिन ऐक गरीब ब्राह्मण राज दरबार में आया था उसे अपनी पुत्री का विवाह करना जा चूकि गरीब होने के कारण धन नहीं था पत्नी के बार बार कहने पर वह आया था पर ब्राह्मण सिद्धांत का पक्का था बिना कुछ दिए हुए भिक्षा भी नहीं लेता था खैर राज दरबार में ऊसका यथोचित सत्कार किया गया था राजकुमार ने आने का कारण पूछा तब ब्राह्मण ने कहा हे राजन मुझे अपनी कन्या का विवाह करना है मेरे पास धन की कमी है अतः मुझे आपसे आर्थिक मदद चाहिए तब राजकुमार ने कहा हे ब्राह्मण आपके लिए रात को खोल देता हूं आपको जितना भी लगे आप ले जा सकते हैं तब ब्राह्मण बोला नहीं नहीं राजन मैं फ्री में किसी से दान भी नहीं लेता मैं आपको एक कागज दे रहा हूं वक्त आने पर इसे पढ़िए गा बहुत काम आएगा खैर ब्राह्मण कागज दे कर धन लेकर अपने घर रवाना ह...

काल गर्ल बैब स्टोरी भाग 07

 उसने चाय बना दी थी दोनों ही नीचे चटाई पर बैठकर चाय कि चुस्कियों लें रहें थें व एक दूसरे को निहार रहे थे कुछ देर बाद विनय कुमार ने कहा था कि आप बुरा नहीं माने तब में आपसे निवेदन करना चाहता हूं कि मेरी पेंटिंग जो आप देख रहीं हैं वह अधूरी है मैं उस पेंटिंग को आपके सहयोग से ही पूरा कर पाऊंगा जैसे कि गुलाबी शुष्क अधर , उन्नत वक्ष,पतली कमर,कमर वह फिर कुछ देर के लिए नग्न हो सकती है मेरा मतलब.... करूणा यूं तो सैकड़ों बार अलग अलग पूरूसो के साथ नग्न हो चुकी थी लेकिन उसे न जाने क्यों आज शर्म आ रही थी करूणा ने सालीनता से जी नहीं  विनय कुमार को शायद जी नहीं जबाब कि उम्मीद नहीं थी उसका चेहरा उदास हो गया था कुछ सोचने लगा था तभी करूणा ने कहा था कि आज नहीं फिर कभी अच्छा आज आप मेरे साथ मेरे फ्लेट पर चलेंगे सहसा ऊसे याद आया था कि आज तो उसकी होटल ब्लू रोज में फुल नाइट कि बुकिंग फुल सर्विस के साथ थी पैसा भी लाखों मिल रहा था उसने मोबाइल निकाल कर संबोधित पुरूष को तीन दिन बाद मिलने का यू कहकर कि वह महीने से हैं जैसा आप चाहते हैं बैसी सर्विस नहीं दे पाऊंगी इसलिए तीन दिन बाद व्हाट्सएप पर मैसेज भेज दिय...