तुम्हें बन ऊपवन जा खोजा पर पा नही सका तेरा जबाब । तू तो वहां मिला शहरों मैं कस्बे से बहुत दूर कच्ची पंगडंडी के पार जहां न मोटर साइकिल पहुंचे न ही बस कार न आलीशान भवन. न महापुरुषो कि भीड़ जहां न कवि न कलाकार. जहां न रोशनी. न वह फैशन जिसकी लपेट मे आ गया संसार ओ काले गुलाब वहा इनसान अपना अतीत भविष्य भूल अनाडी सा कबाड़ी सा शराबी सा. कचरे का ढेर खरीद रहा. मोल कर रहा ऊन बातों का ऊस समाज का. ऊस साहित्यि का जिसका से , वास्तविकता नहीं पर अंधेरे में खो जाने का , इससे अच्छा रास्ता नहीं ।। ओ काले गुलाब तुम वहां मिले ,जहां बरसात मे कीचड़ भरे रास्ते बिना छाता के टाट से या काठ के पत्तों से अपने को बचाते नर पानी से भरे मिट्टी के घर. जो बरसात मैं भीगते है ठन्ड मे ठिठरने को मजबूर. करते हैं गर्मी कि ऊमस और लू लपटें से चाहे जब अपने आप को तपाते है पर अपने सहने कि छमता पर फिर परमात्मा पर अगाध विश्वास कर क...
अपनी सी कहानियां का पिटारा