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म्र सत्तर कि नखरे बचपन के "परिवार कि कहानी

रमा नाश्ता तैयार कर रही थी तभी आवाज आई बहू ओ बहू तूने चाय में शक्कर  नहीं डाली पता नहीं कहां रहता है दिमाग कुछ देर बाद बहू तूने पानी गर्म किया या नहीं फिर कुछ देर बाद अरे ओ बहु मेरे लिए पालक पराठा वना देना ऐसे ही उसकि सास उसे आदेश देते रहती थी वह उनके हर आदेश का पालन करती थी । ऐतवार का दिन था पति सुबोध छुट्टी होने के कारण बच्चों के साथ कैरम बोर्ड पर गोटियां खेल रहे थे चूंकि वह दोनों बच्चों सहित तीन ही हों रहें थें चौथा खिलाड़ी कम हों रहा था तभी तों बेटी सुचित्रा ने आवाज देकर मम्मी आप भी आ जाइए न उसकी बात खत्म भी नहीं हुई थी तभी बेटा गोलू ने कहा मम्मी आ जाइए न देखो दीदी मेरे साथ चिटिंग कर रही है मुझे बार बार हरा रहीं हैं रमा ने किचन से आवाज देकर जवाब दिया न बाबा न मुझे बहुत काम करना हैं उसके मना करने पर पति सुबोध ने अरे भाई आ जाइए न बच्चे जिद कर रहें हैं काम तो बाद में होता रहेगा पति के कहते ही रमा कमर में साड़ी का पल्लू खोंसकर कैरम खेलने लगी थी बाजी खत्म भी नहीं हो पाई थी तभी अम्मा जी ने बेडरूम से लेटे लेटे आवाज लगाई बहू ओ बहू बात कि बाम लाकर मेरे घुटनों में मालिश कर देना वह खेल छोड़कर