भोर का समय था मंदिरों में पूजा-अर्चना चल रही थी लाउडस्पीकर पर आरती सुनाई दे रही थी कहीं दूर मुर्ग बाग लगा रहा था पेड़ों पर पंछी चहचहा रहें थे मानों इंसान को जगाने का प्रयास कर रहे हों कि उठो देखो शुवह का सुर्य देव का उदय होने का नजारा कितना सुंदर है लालिमा के साथ कितनी उर्जा लेकर आ रहे हैं । ही समय मुन्ना लाल कि नींद खुल गई थी उन्होंने विस्तर पर करवट ले कर धीरे से फुसफुसा कर कहा उठो मनोरमा देखो भोर हो गई है वाहर पंछी चहचहा रहें हैं भाई जल्दी से मुझे चाय बना देना यह बेड टी कि आदत भी है न कितनी ख़राब है अब देखो उसके बिना पेट भी अच्छे से साफ नहीं होता है परंतु उत्तर न मिलने से वह चौंक गए थे फिर खुद ही खीज उठें थे शायद उन्हें अपनी भुलक्कड़ आदतों से चिढ़ उठ रहीं थीं क्योंकि उनकी अर्धांगिनी तो पिछले छः महीने पहले ही दिल कि बीमारी से भगवान के पास चली गई थी उसकी यादों में कुछ पल खोए हुए थे आंखों से कुछ अश्रुपूर्ण बूंद गालों पर लुढ़क गई थी खैर मन मारकर विस्तर छोड़ दिया था फिर किचन में जाकर चाय बना ने लगें थे पर चाय कि पते ली हाथ से छिटक कर नीचे फर्श पर गिर पड़ी थ...
अपनी सी कहानियां का पिटारा