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तुम कहां हो

 तुम कहां हो? कहां नहीं हों ? दोनों अनंत काल से चले आ रहें शाश्वत प़शन है इनके उत्तर भी अनंत काल से  शाश्वत हैं। प़भु के बगैर होना तो दूर कल्पना भी संभव नहीं तुम सर्वत्र हो प़भु कण कण में समाए हों प़भु तुम यहां भी हों वहां भी हों आपके बिना कहते हैं कि  पत्ता भी नहीं हिल सकता मंद मंद शीतल पवन नहीं वह सकतीं कल कल करती नदियां नही बह सकतीं हिलोरें मारकर विशाल सागर  अपनी सीमा में नहीं रहता न ही सूर्य अपनी तपिश बिखेर कर हमें रोशनी देता न ही चांद दीए जैसी रोशनी से हमें  शीतलता देता  पूछता हूं प़भु तुम कहां हो। हे प्रभु जब से हम मानव कि अगली पीढ़ी से लेकर  आखिर पीढ़ी तक यह प़शन हमें तबाह किये हुए हैं  बर्बादी के द्वार पर खड़ा किए हुए हैं हे प्रभु प़शन अटपटा सा है पर शब्दों कि गूंज उत्तर के रूप में होती है पर परतीत नहीं होती  हे प्रभु कभी कभी लगता है कि आप हमारे अन्तर मन में हों  तब कभी कभी लगता है कि आप कण कण में हों  तब कभी कभी लगता है कि दीन हीन लाचार अपाहिज मानव  पशु पंछी कि देखभाल करने में  हमें भूल गए हों  लेकिन यह सच है कि प़भु आप तो हो  पर आप कहां हो,??

एलियन कि बस्ती परिकल्पना

जून के पहले सप्ताह में गर्मी अपना असली रूप दिखाती है दिन का पारा पचास डिग्री से उपर कहीं कहीं चला जाता है ऐसे में एसी,कूलर, पंखे, बेचारे मजबूर होकर गर्म हवा उगलने लगते हैं कुछ तो गर्म होकर जल जाते हैं या फिर कुछ भीषण गर्मी में अपने आप को एकाकार कर  लेते हैं खैर दिन तो कैसे भी कट जाता है परन्तु रात्री में ठंडक नहीं हों तब नींद हजारों कोश दूर रहकर पास नहीं आतीं सारी रात पसीना से नहाएं हुए करवट बदल कर रात गुजारने पड़ती है परन्तु कुछ लोग तो खुले आसमान में चांद तारों को निहारते हुए खटिया पर मच्छर दानी लगाकर नींद लेना पसंद करते हैं में ऐसे ही एक रात छत पर खटिया पर लेटकर चांद असंख्य तारे निहार रहा था कुछ टूटकर रोशनी बिखरते हुए तारों को देख रहा था आकाश गंगा को देखता हुआ कब नींद के आगोश में समा गया पता ही नहीं चला  शायद एक झपकी ही लें पाया था तभी किसीने कि मधुर ध्वनि सुनाई दी थी बेटा मोहन  देख में तुझे लेने आया हूं मेरे कानों में यह आवाज तीन बार सुनाई दी थी में जाग गया था मैंने देखा मेरी खटिया के बगल में एक विचित्र प्राणी खड़ा था जिसकी देह कि रूप रेखा न तों इंसान से मिलती थी न ही जानवर से उसका