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Showing posts from 2021

मौन साधना दर्शन लेख

 कहते हैं कि मौन में बहुत शक्ति है मौन साधना से बड़ी कोई भी साधना कभी भी अकेले नहीं होती है आप अपने देखने के टैग से जान लें कि हमारे अंदर की भीड़ में हम अपने अंदर हंकारते हैं। क्या कभी आपने अकेले में अपनी आत्मा से एकांत में भाग लिया है शायद आज हमारे पास समय ही नहीं है क्योंकि यह सोशल मीडिया का जमाना है क्योंकि यह विज्ञान की मशीन का जमाना है क्योंकि मनुष्य बटन एक पर सब कुछ बताता है और यहां तक ​​जाता है कि हमारे शरीर में कौन सी कमी है हमारे शरीर को स्वस्थ रखने के लिए हमारे शरीर को किसी भी तरह से कुछ तैयार करना चाहिए हमें फिर से बताएं कि हम क्यों हैं कि आप अपने साथ एक साथ रहें। है. कभी-कभी हम आपको अलग-अलग दिखाते हैं क्योंकि आधुनिक युग में परिवार का एक दूसरे के लिए प्रेम मंदिर न तो बचा है और न ही खाली हो रहा है। शांति समाप्त हो गई है और हमराद्रा में ग्राहक अपना सब कुछ खो देते हैं ठीक है अब सवाल है कि हमें मौन साधना क्यों करनी चाहिए। कहते हैं कि मन के हारे-हारे है मन के जीते हुए मन क्या करता है, यह बहुत ही सूक्ष्म प्रश्न है, बड़े-बड़े साधक, संतों के पास, संतोष के पास, उत्तर नहीं, यह बोध...

नर्क का रास्ता

 सुना है कि नर्क भी होता है । जहां आत्मा को कष्ट भोगना पड़ता है। सारे जीवन का लेखा-जोखा देवदूत  आत्मा के सामने रखते हैं  फिर न्यायालय जहां उनके भी  न्यायमूर्ति न्याय के लिए  आत्मा से सवाल जवाब करते हैं । चूंकि सुना है कि वहां पर काले कोट  का वकील नहीं होता  जो वहस कर , दंड से मुक्त करा दें  या फिर किसी न्यायालय  के न्यायाधीश को  कुछ रकम या धन  क्लर्क के माध्यम से  पहुंचा दें ? चूंकि यह व्यवस्था वहां नहीं है । इसलिए आत्मा को ही परमात्मा से सवाल जवाब करने पड़ते हैं । जैसे कि सारे जीवन क्या किया  मानव मूल्य का कितना  पालन किया ? माता पिता, बुजुर्ग,कि  सेवा कि या नही ? परिवार के प्रति वफादार रहें  कि नहीं । तुम पति-पत्नी बन गये थे  समाज ने तुम्हरा व्याह कराया था  फिर क्यों संभोग सुख के लिए पर पुरुष  पर नारी का उपयोग किया ! जल का कैसा उपयोग किया  जमीं के लिए कितना छूठ बोला  वनस्पतियों की इज्जत कि  उन्हें पानी दिया कि नही ? खुद के सुख के लिए या व्यापार के लिए कितने  पेड़ पोंधे क...

" जिदंगी का सफ़र " कविता चिंतन

 जिदंगी तेरी परिभाषा क्या है  क्या बताएंगी ? क्या कुछ कहेंगी  या फिर मोन ही रहेंगी   तेरी यात्रा मां  के गर्भ से उत्पन्न हुई  जहां तुझे पृथ्वी पर  लाने के लिए  अस्पताल में  मां दर्द से व्याकुल हो कराह रही थी ! पिता अस्पताल के काउंटर पर  फीस जमा कर रहा था , बार बार नर्स डाक्टर से  तुझे तेरी मां को सकुशल  रखने कि गुहार लगा रहा था । खैर अस्पताल के बैड पर से  पहली यात्रा शुरू हुई थी  तेरी  रोने कि किलकारी  से माता-पिता कुटुंब जन  खुशी से झूम उठे थे । फिर भगवान को बार-बार धन्यवाद कह रहे थे ।  था व्याह  अब क़ानून समाज  से डर नहीं लगता था  दो शरीर एक जान थे  संभोग का आनंद लें रहें थे  फिर जन्मे थें बच्चे  जो थे अपने  चूंकि उनके भविष्य  का ख्याल था  इसलिए धन दौलत इकट्ठा करने  का ख्याल था! अर्थ के लिए संघर्षरत हुए  >  व्यापार कहीं नौकरी कि  छल कपट से पैसा कमाया  फिर घर बनाया ! जिंदगी छल कपट से आगे बढ़ीं ! फिर मां बाप बुढ़ा हो गए...

जिदंगी का सफ़र; कविता चिंतन

 जिदंगी तेरी परिभाषा क्या है  क्या बताएंगी ? क्या कुछ कहेंगी  या फिर मोन ही रहेंगी   तेरी यात्रा मां  के गर्भ से उत्पन्न हुई  जहां तुझे पृथ्वी पर  लाने के लिए  अस्पताल में  मां दर्द से व्याकुल हो कराह रही थी ! पिता अस्पताल के काउंटर पर  फीस जमा कर रहा था , बार बार नर्स डाक्टर से  तुझे तेरी मां को सकुशल  रखने कि गुहार लगा रहा था । खैर अस्पताल के बैड पर से  पहली यात्रा शुरू हुई थी  तेरी  रोने कि किलकारी  से माता-पिता कुटुंब जन  खुशी से झूम उठे थे । फिर भगवान को बार-बार धन्यवाद कह रहे थे ।  था व्याह  अब क़ानून समाज  से डर नहीं लगता था  दो शरीर एक जान थे  संभोग का आनंद लें रहें थे  फिर जन्मे थें बच्चे  जो थे अपने  चूंकि उनके भविष्य  का ख्याल था  इसलिए धन दौलत इकट्ठा करने  का ख्याल था! अर्थ के लिए संघर्षरत हुए  >  व्यापार कहीं नौकरी कि  छल कपट से पैसा कमाया  फिर घर बनाया ! जिंदगी छल कपट से आगे बढ़ीं ! फिर मां बाप बुढ़ा हो गए...

लिव इन रिलेशनशिप जज़्बात कि कहानी

      भोर का समय था मंदिरों में पूजा-अर्चना चल रही थी लाउडस्पीकर पर आरती सुनाई दे रही थी कहीं दूर मुर्ग बाग लगा रहा था पेड़ों पर पंछी चहचहा रहें थे मानों इंसान को जगाने का प्रयास कर रहे हों कि उठो देखो शुवह का सुर्य देव का उदय होने का नजारा कितना सुंदर है लालिमा के साथ कितनी उर्जा लेकर आ रहे हैं । ही समय मुन्ना लाल कि नींद खुल गई थी उन्होंने विस्तर पर करवट ले कर धीरे से फुसफुसा कर कहा उठो मनोरमा देखो भोर हो गई है वाहर पंछी चहचहा रहें हैं भाई जल्दी से मुझे चाय बना देना यह बेड टी कि आदत भी है न कितनी ख़राब है अब देखो उसके बिना पेट भी अच्छे से साफ नहीं होता है परंतु उत्तर न मिलने से वह चौंक गए थे फिर खुद ही खीज उठें थे शायद उन्हें अपनी भुलक्कड़ आदतों से चिढ़ उठ रहीं थीं क्योंकि उनकी अर्धांगिनी तो पिछले छः महीने पहले ही  दिल कि बीमारी से भगवान के पास चली गई थी उसकी यादों में कुछ पल खोए हुए थे आंखों से कुछ अश्रुपूर्ण बूंद गालों पर लुढ़क गई थी खैर मन मारकर विस्तर छोड़ दिया था फिर किचन में जाकर चाय बना ने लगें थे  पर चाय कि पते ली हाथ से छिटक कर नीचे फर्श पर गिर पड़ी थ...

सेठ लछमी चंद को रूपयों पैसे कि कोई भी तंगी नहीं थी

 यूं तो सेठ लछमी चंद को रूपयों पैसे कि कोई भी तंगी नहीं थी भगवान का दिया हुआ सब कुछ था दर्जनों  कारे  बंगले थे हजारों  करोड़ रुपए कि (रियल एस्टेट) कम्पनी के मालिक थे  अनेकों शहरों में व्यापार फैला था सेकंडों नोकर चाकर थे पावर इतना कि बढ़े बढ़े मंत्री चाय पीने को आते थे उच्च पदों पर बैठे सरकारी मुलाजिमों से अच्छा यराना था ऐक फ़ोन पर फाइलों में साइन करा लेने का अधिकार रखते थे वो बात अलग थी कि सेठ समय समय पर         " अपनी यारी नोटों के बंडल भेंट रूप में देकर निभाते रहते थे  खैर पैसे से कैसे पैसे बनाए जाते थे उन्हें हर गुर बखूबी आता था  यूं तो सेठ लछमी चंद को रूपयों पैसे कि कोई भी तंगी नहीं थी भगवान का दिया हुआ सब कुछ था दर्जनों  कारे  बंगले थे हजारों  करोड़ रुपए कि (रियल एस्टेट) कम्पनी के मालिक थे  अनेकों शहरों में व्यापार फैला था सेकंडों नोकर चाकर थे पावर इतना कि बढ़े बढ़े मंत्री चाय पीने को आते थे उच्च पदों पर बैठे सरकारी मुलाजिमों से अच्छा यराना था ऐक फ़ोन पर फाइलों में साइन करा लेने का अधिकार रखते थे वो बात अल...

सेठ लछमी चंद को रूपयों पैसे कि कोई भी तंगी नहीं थी

 यूं तो सेठ लछमी चंद को रूपयों पैसे कि कोई भी तंगी नहीं थी भगवान का दिया हुआ सब कुछ था दर्जनों  कारे  बंगले थे हजारों  करोड़ रुपए कि (रियल एस्टेट) कम्पनी के मालिक थे  अनेकों शहरों में व्यापार फैला था सेकंडों नोकर चाकर थे पावर इतना कि बढ़े बढ़े मंत्री चाय पीने को आते थे उच्च पदों पर बैठे सरकारी मुलाजिमों से अच्छा यराना था ऐक फ़ोन पर फाइलों में साइन करा लेने का अधिकार रखते थे वो बात अलग थी कि सेठ समय समय पर         " अपनी यारी नोटों के बंडल भेंट रूप में देकर निभाते रहते थे  खैर पैसे से कैसे पैसे बनाए जाते थे उन्हें हर गुर बखूबी आता था  यूं तो सेठ लछमी चंद को रूपयों पैसे कि कोई भी तंगी नहीं थी भगवान का दिया हुआ सब कुछ था दर्जनों  कारे  बंगले थे हजारों  करोड़ रुपए कि (रियल एस्टेट) कम्पनी के मालिक थे  अनेकों शहरों में व्यापार फैला था सेकंडों नोकर चाकर थे पावर इतना कि बढ़े बढ़े मंत्री चाय पीने को आते थे उच्च पदों पर बैठे सरकारी मुलाजिमों से अच्छा यराना था ऐक फ़ोन पर फाइलों में साइन करा लेने का अधिकार रखते थे वो बात अल...

." 1921 से आज तक" लेख

सौ( 100)साल पहले हम  कहां पर  थे  और अब हम कहां हैं इस बीच के अंतर का सही अर्थों में तुलनात्मक समीक्षा करें तब हमने प्रकृति से क्या पाया और क्या खोया इस सवाल का जवाब शायद हमारे पास हैं या नहीं ?? फिर भी चलिए एक बार समय के बीच के अंतर समझने का प्रयास कर्ता हूं । लगभग १०० साल पहले । (१) हमारे पास पहाड़ थे  / जो अभी भी हैं ।   (२) हमारे पास जंगल थे/ जो अभी भी हैं । ( ३) हमारे पास नदी भी थीं / जो अभी भी हैं । (४) हमारे पास मीठे-मीठे पानी के झरने थे / जो अभी भी हैं। ( ५) हमारे पास सरोवर थे  जिनसे नदी वारह मांस वहती रहतीं थीं / पर अब बड़े  बड़े बांध है । (६) हमारे पास कुएं थे जिनसे हमें मीठा जल पीने को मिलता था व खेती होती थी / पर अब बोर हैं । (७) हमारे पास हल थे जो खेत के सीने को फ़ाड़ कर खेत में अनाजों के बीजों को बोने में सहयोग करते थे जिनसे हमारे-आपके अन्न भंडार भरे पड़े रहते थे /पर अब टैक्टर है जिनके मदद से हमारे अन्न भंडार भरे पड़े हैं। (८) कुओं से खेती-बाड़ी हेतु रहट थे जिन्हें हम बैलों कि मदद से चलाते थे  जिनसे न ही बिजली कंपनियों को बिल देना पड...

." 1921 से आज तक" लेख

सौ( 100)साल पहले हम  कहां पर  थे  और अब हम कहां हैं इस बीच के अंतर का सही अर्थों में तुलनात्मक समीक्षा करें तब हमने प्रकृति से क्या पाया और क्या खोया इस सवाल का जवाब शायद हमारे पास हैं या नहीं ?? फिर भी चलिए एक बार समय के बीच के अंतर समझने का प्रयास कर्ता हूं । लगभग १०० साल पहले । (१) हमारे पास पहाड़ थे  / जो अभी भी हैं ।   (२) हमारे पास जंगल थे/ जो अभी भी हैं । ( ३) हमारे पास नदी भी थीं / जो अभी भी हैं । (४) हमारे पास मीठे-मीठे पानी के झरने थे / जो अभी भी हैं। ( ५) हमारे पास सरोवर थे  जिनसे नदी वारह मांस वहती रहतीं थीं / पर अब बड़े  बड़े बांध है । (६) हमारे पास कुएं थे जिनसे हमें मीठा जल पीने को मिलता था व खेती होती थी / पर अब बोर हैं । (७) हमारे पास हल थे जो खेत के सीने को फ़ाड़ कर खेत में अनाजों के बीजों को बोने में सहयोग करते थे जिनसे हमारे-आपके अन्न भंडार भरे पड़े रहते थे /पर अब टैक्टर है जिनके मदद से हमारे अन्न भंडार भरे पड़े हैं। (८) कुओं से खेती-बाड़ी हेतु रहट थे जिन्हें हम बैलों कि मदद से चलाते थे  जिनसे न ही बिजली कंपनियों को बिल देना पड...

"कंटीली राहें " एक लेखक कि आत्म कथा भाग एक

 का जन्म संवत् 1971 माह 06 तारीख   30 को हुआ था ईश्वर ने धरती पर दो माह पहले ही भेज दिया था  हां उस समय देश  का पड़ोसी  देशों से युद्ध चल रहा था सीमा के आर पार बम धमाके हो रहै थे दोनों और भय का माहौल था ऐसे ही समय सावन कि घनघोर वारिस गरज चमक के साथ  एक मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मे थे कलमकार खैर जन्म होने कि अगले सुबह ठीक ठाक रात्रि पहर को याद कर घर के बड़े मुखिया जो रिश्ते में दादा लगते थे सुबह ही पंडित जी के पास नामकरण संस्कार के लिए पहुंच गए थे  पंडित मुरलीधर नित्य कर्म से निवृत्त होकर चबूतरे पर लोटा में जल भरकर नीम कि दातुन से अपने तम्बाकू से मैले दांतों को माज रहें थै सहसा नजर घुमाकर  पंडितजी,‌‌:-  सुबह-सुबह से कैसे आना हुआ दाए जू बुन्देलखण्ड कि ग्रामीण संस्कृति मे ठाकुर समाज के बड़े बुजुर्गो को दाऊ जू कहकर आज भी संबोधित करते हैं । दाऊ जू जिनका शुभ नाम ठाकुर सुमर सिंह था मजबूत कद काठी गोरा चिट्ठा कसरती बदन   के ऊपर सफेद  सफेद रोबदार मूंछ फिर सफेद ही दाढ़ी लगभग सत्तर साल कि उम्र होने के बाद भी किसी पहलवान से कम नहीं थे...

कंटीली राहें एक लेखक कि आत्म कथा भाग एक

 का जन्म संवत् 1971 माह 06 तारीख   30 को हुआ था ईश्वर ने धरती पर दो माह पहले ही भेज दिया था  हां उस समय देश  का पड़ोसी  देशों से युद्ध चल रहा था सीमा के आर पार बम धमाके हो रहै थे दोनों और भय का माहौल था ऐसे ही समय सावन कि घनघोर वारिस गरज चमक के साथ  एक मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मे थे कलमकार खैर जन्म होने कि अगले सुबह ठीक ठाक रात्रि पहर को याद कर घर के बड़े मुखिया जो रिश्ते में दादा लगते थे सुबह ही पंडित जी के पास नामकरण संस्कार के लिए पहुंच गए थे  पंडित मुरलीधर नित्य कर्म से निवृत्त होकर चबूतरे पर लोटा में जल भरकर नीम कि दातुन से अपने तम्बाकू से मैले दांतों को माज रहें थै सहसा नजर घुमाकर  पंडितजी,‌‌:-  सुबह-सुबह से कैसे आना हुआ दाए जू बुन्देलखण्ड कि ग्रामीण संस्कृति मे ठाकुर समाज के बड़े बुजुर्गो को दाऊ जू कहकर आज भी संबोधित करते हैं । दाऊ जू जिनका शुभ नाम ठाकुर सुमर सिंह था मजबूत कद काठी गोरा चिट्ठा कसरती बदन   के ऊपर सफेद  सफेद रोबदार मूंछ फिर सफेद ही दाढ़ी लगभग सत्तर साल कि उम्र होने के बाद भी किसी पहलवान से कम नहीं थे...

"हेराफेरी" कविता चितंन.

आत्मा ने मुझसे कहां  तुझे परमात्मा ने क्यों भेजा पता है तुझे तुने कितने कितने वादे किए ?? मे तुनक कर बोला  हा मुझे मालूम है  ऊस समय मां के पेट मे था । पेशाब मे लथपथ था  गर्भ गृह मे थे बहुत सारे कीड़े जो थें अल बेले  बिन नख दंत के  काटते थें  बहुत दर्द होता था  पर किसी से कह नहीं सकता था ? मज़बूरी थी  मुक्ति चाहिए थी  इसलिए कर दिए होगे वादे  अजब गजब निराले  परमात्मा को सारे  पर अब तो मे  मजबूर नहीं  कोई जेल गृभगृह जैसी नही ? न ही काटते है टिंडे  न ही पडा हूँ  पेशाब टट्टी पर  में आजाद हूं उड़ता हूं मस्त  गगन मे पंछी कि तरह  घूमता हूं हवाई जहाज पर  जाता हू यूरोप  अमेरिका पाकिस्तान बंगाल देश और आस्ट्रेलिया  इंग्लैंड करता हू डांस  जवान मधुबाला से  मधुशाला पहुंच कर पिता हूं वियर और शराब फिर पहुंच जाता है मस्तिष्क सात समुद्र पार सात लोक  चांद मंगल गृह पर  जहां मुझे खोजना है नया बसेरा  करूगां खेती-बाड़ी उगाएं गा अनाज  जो भरेगा पेट लगाऊंगा बाग  फल...

"हेराफेरी" कविता चितंन.

आत्मा ने मुझसे कहां  तुझे परमात्मा ने क्यों भेजा पता है तुझे तुने कितने कितने वादे किए ?? मे तुनक कर बोला  हा मुझे मालूम है  ऊस समय मां के पेट मे था । पेशाब मे लथपथ था  गर्भ गृह मे थे बहुत सारे कीड़े जो थें अल बेले  बिन नख दंत के  काटते थें  बहुत दर्द होता था  पर किसी से कह नहीं सकता था ? मज़बूरी थी  मुक्ति चाहिए थी  इसलिए कर दिए होगे वादे  अजब गजब निराले  परमात्मा को सारे  पर अब तो मे  मजबूर नहीं  कोई जेल गृभगृह जैसी नही ? न ही काटते है टिंडे  न ही पडा हूँ  पेशाब टट्टी पर  में आजाद हूं उड़ता हूं मस्त  गगन मे पंछी कि तरह  घूमता हूं हवाई जहाज पर  जाता हू यूरोप  अमेरिका पाकिस्तान बंगाल देश और आस्ट्रेलिया  इंग्लैंड करता हू डांस  जवान मधुबाला से  मधुशाला पहुंच कर पिता हूं वियर और शराब फिर पहुंच जाता है मस्तिष्क सात समुद्र पार सात लोक  चांद मंगल गृह पर  जहां मुझे खोजना है नया बसेरा  करूगां खेती-बाड़ी उगाएं गा अनाज  जो भरेगा पेट लगाऊंगा बाग  फल...

2021 कोविड 19

 मे ऐक वयापारी  ऊधार लेकर शुरू किया  बिजनेस  कोबिड 19 के लोक डाऊन के बाद  चालू किया काम  बिन सोचे समझे ले लिया जी ऐस टी नमबर  अब हर महीने रिटर्न भरने का  रहता था सिरदर्द  खैर प़ाईवेट कंपनी मे लिया था काम  जहां काम करना हो गया है हराम  भाई साहब कुछ अनपढ़ जाहिल  बन गये सुपरवाइजर  कुछ है पढे लिखे इंजीनियर जो चलते है ऐक घंमड लेकर  समझते है कंपनी मेरे बाप कि है. मेरे दादा नाना कि है. ठेकेदार है अपना गुलाम  जिसका करना है काम तमाम   पैसा  कमाकर नहीं जाऐ  कसम से करने नहीँ दूगा काम  निकालूँगा कमिया  नही दूगा पूर कारड  नहीं होगा पैमंट  रहेगा बैचैन । यह तो कंपनी के  सटाफ कि बात है  ठेकेदार का काम तमाम है. लेवर रोज छेड़छाड़ कर  दबी जुवान से कहती है  भाई साहब  पैमंट कब मिलेगा  मेरा भी घर परिवार है  ठेकेदार बढे विश्वास से  आज कल कह कह टाल रहा है  पर ऊसे है पता  मे छूठ बोल रहा हू । जी ऐस टी  विभाग से टेलीफोन आता है  भाई आप का रिटर्न...

गुलाब का फूल .

तुम्हें बन ऊपवन जा खोजा  पर पा नही सका तेरा जबाब । तू तो वहां मिला  शहरों मैं कस्बे से बहुत दूर कच्ची पंगडंडी के पार  जहां न मोटर साइकिल पहुंचे  न  ही बस कार  न आलीशान भवन. न महापुरुषो कि भीड़  जहां न कवि न कलाकार. जहां न रोशनी. न वह फैशन  जिसकी लपेट मे  आ गया संसार ओ काले गुलाब  वहा इनसान अपना  अतीत भविष्य भूल अनाडी सा  कबाड़ी सा  शराबी सा. कचरे का ढेर खरीद रहा.  मोल कर रहा  ऊन बातों का  ऊस समाज का. ऊस साहित्यि का  जिसका  से ,  वास्तविकता नहीं  पर अंधेरे में खो जाने का , इससे अच्छा रास्ता नहीं ।। ओ काले गुलाब  तुम वहां मिले ,जहां बरसात  मे कीचड़ भरे रास्ते  बिना छाता के  टाट से या काठ के  पत्तों से अपने को बचाते नर  पानी से भरे मिट्टी के घर. जो बरसात मैं भीगते  है  ठन्ड मे ठिठरने को मजबूर. करते हैं  गर्मी कि ऊमस  और लू लपटें से  चाहे जब  अपने आप को तपाते है  पर अपने सहने कि छमता पर  फिर परमात्मा पर  अगाध विश्वास कर क...