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कर्ज से मुक्ति

यूं  मुक्ति के अनेकों अर्थ है यानी मुक्त होने के जैसे कि कर्ज से मुक्ति,मन कि चिंता से मुक्ति, ,जीवन से मुक्ति इत्यादि पर ठाकुर साहब उस थकाऊ नौकरी से मुक्ति पाना चाहते थे जहां पर समय का कोई भी हिसाब किताब नहीं था , जहां का स्टाफ के कुछ सदस्यों को इंसान से कोई भी लेना देना नहीं था उसका कारण यह था कि बे कंपनी कि तरफ से पड़  लिखे इंजीनियर थे यानी किसी के पास सिविल इंजीनियर का डिप्लोमा था या फिर डिग्री पर भले ही धरातल पर काम करने में बे सब जीरो थे पर कंपनी के अफसर उन्हें ही ज्यादा इज्जत देते थे  उन्हें ही ज्यादा पावर दिए गए थे जैसे कि सुपरवाइजर फोर मेन से ज्यादा से काम लेना मजदूरों को इंसान नहीं समझना , ठेकेदार से कमिशन लेंना आदि ठाकुर साहब कंट्रक्शन कंपनी में सीनियर सुपरवाइजर थें उनका नाम नरेंद्र सिंह ठाकुर था बड़े ही सरल हृदय व दयालु थे साथ ही मेहनत कश कर्मठ, ईमानदार इसी के कारण वह मालिक लोगों के खासमखास थें उन्हें बहुत सारी जिम्मेदारी दी गई थी जैसे कि मटेरियल पर नजर रखना उसकी क्वालिटी चेक करना साइट कि अन्य व्यवस्थाएं फिर कंट्रक्शन के हर आइटम कि क्वालिटी कंट्रोल करना इत्याद...

." 1921 से आज तक" लेख

सौ( 100)साल पहले हम  कहां पर  थे  और अब हम कहां हैं इस बीच के अंतर का सही अर्थों में तुलनात्मक समीक्षा करें तब हमने प्रकृति से क्या पाया और क्या खोया इस सवाल का जवाब शायद हमारे पास हैं या नहीं ??
फिर भी चलिए एक बार समय के बीच के अंतर समझने का प्रयास कर्ता हूं ।
लगभग १०० साल पहले ।
(१) हमारे पास पहाड़ थे  / जो अभी भी हैं । 
(२) हमारे पास जंगल थे/ जो अभी भी हैं ।
( ३) हमारे पास नदी भी थीं / जो अभी भी हैं ।
(४) हमारे पास मीठे-मीठे पानी के झरने थे / जो अभी भी हैं।
( ५) हमारे पास सरोवर थे  जिनसे नदी वारह मांस वहती रहतीं थीं / पर अब बड़े  बड़े बांध है ।
(६) हमारे पास कुएं थे जिनसे हमें मीठा जल पीने को मिलता था व खेती होती थी / पर अब बोर हैं ।
(७) हमारे पास हल थे जो खेत के सीने को फ़ाड़ कर खेत में अनाजों के बीजों को बोने में सहयोग करते थे जिनसे हमारे-आपके अन्न भंडार भरे पड़े रहते थे /पर अब टैक्टर है जिनके मदद से हमारे अन्न भंडार भरे पड़े हैं।
(८) कुओं से खेती-बाड़ी हेतु रहट थे जिन्हें हम बैलों कि मदद से चलाते थे  जिनसे न ही बिजली कंपनियों को बिल देना पड़ता था और न ही पर्यावरण को कोई भी फर्क नहीं पड़ता था /पर अब डीजल इंजन भी है जिनके धुएं से हमें स्वस्छ वायु नहीं मिलती है फिर बिजली के दाम भी नहीं भरने पड़ते थे ।
( ९) चूंकि पहले समय में हम पशु धन पर ही आश्रित थे जैसे कि दूध ,दही ,घी ,छाछ आदि और हल, रहट, बैलगाड़ी आदि पशु हमें बदले में गोबर देते थे जिसका हम खाद के रूप में इस्तेमाल करते थे हमें अच्छा अनाज मिलता था /पर अब पशु धन हमसे दूर हों गया है हमारे पास मशीन धन ही है वह हमें क्या दें रहा है विचार करे।
(१०) पहले हमारी औसत आयु १०० साल थीं शरीरों को कोई भी बीमारी नहीं होती थी जैसे कि शुगर, उच्च रक्तचाप, कैंसर आदि /आज हमारी औसत आयु ६० साल है फिर हमारे शरीरों को नाना प्रकार के रोगो ने घेर लिया है छोटे छोटे बच्चों को भी कहीं कहीं शुगर जैसी बीमारियों ने जकड़ लिया हैं ।
( ११) पहले हम लकड़ी के चूल्हे पर खाना पकाते थे जो सही अर्थों में पकता था जिसका स्वाद भी अच्छा रहता था / और अब हम गैसों से , बिजली के चूल्हे पर खाना पकाते हैं न ही स्वादिष्ट भोजन मिलता है ।
(१२) पहले हम मिट्टी के बर्तन का पानी पीने हेतु भंडार करने चूल्हे पर खाना पकाने हेतु करते थे जैसे कि चूल्हा, तवा,कहाडी,मटका,मटकी, सुराही आदि जिनसे मिट्टी कि भीनी-भीनी सौंधी खुशबू हमें मिलती-जुलती थी ठंडा जल पीने मिलता था और अब / पर अब हमारे  बीच फ़िजी है ठंडा प्लास्टिक कि बोतल में अधिक दामों पर उपलब्ध है स्टील लेश वर्तन है ऐलमोनियम के वर्तन है  फ़िज के ठंडे पानी से हमें सर्दी , जुखाम, गला ख़राब, हों जाता है और वर्तन से कैमीकल कि खुशबू आती है ।
(१३) पहले हमारे परिवार संयुक्त परिवार था जो कि दुःख सुख में एक दूसरे का सहयोग करते थे एक ही घर में सब रहते थे एक ही चूल्हे पर खाना पकता था माता पिता बुजुर्ग का सम्मान करते थे ऊनकि सेवा होती थी /पर अब  हम अलग-अलग रहने लगे घर को छोड़कर फ्लेट में जा रहे हैं अगर भाई परेशान हैं तब उसका सहयोग नहीं करते माता पिता को बृध आश्रम में छोड़ कर अपने कर्तव्य से निवृत हो जातें हैं ।
(१४) पहले हम मिट्टी से बने घरों में रहते थे जो पर्यावरण के अनुकूल थे गर्म मौसम में ठंडग व ठंडा मौसम में हमें गर्म रखते थे / पर अब हम हाईराइज बिल्डिंग में रहते हैं जो बेहद गर्म रहते हैं ।
(१४) पहले हमारे घरों में खिड़की रोशन दान खुलें हुए रहते थे जिनसे प्रकाश व स्वच्छ हवा हमें मिलती थी /पर अब खिड़की तो रहतीं हैं पर उसे एलमोनियम सीसे से बंद कर दिया जाता है सीसे पर जो सूर्य की किरणें पड़ती है आर पार जाती है जिससे गर्म वातावरण उपलब्ध होता है फिर एक सी के दौरान हम ठंडा रखतें हैं  जो हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करता है ।
यह पिछले सौ साल और आज तक के बीचों-बीच के समय के अंतराल का विश्लेषण हैं हमने प्रकृति से खिलवाड़ कर क्या पाया और क्या खोया ??  हमने पहाड़ों को खोदा क्यों कि हमें अपने बहुमंजिला इमारत के लिए मुरम पत्थर चाहिएं उन पर लहलहाते जंगल वनस्पति नष्ट हो रही है फिर हमने धरती के सीने पर बोरिंग कि कभी कभी कहीं पानी मिलता है या नहीं पर हमारे कुएं सूख गए है हमने डीजल पेट्रोल के लिए धरती पर असंख्य छेद किए ठीक-ठाक है हमें इंधन मिला पर बदलें में हमें भूकंप सुनामी जैसी आपदाओं का सामना करना पड़ा कहीं अधिक वर्षा हो रही है तब कहीं सूखापन देखने को मिल रहा है किसी किसी देश में ठंड ज्यादा होने लगीं हैं तब कहीं अधिक गर्मी हिमालय पर्वत जैसे पहाड़ों पर सदियों से जमी बर्फ पिघल रही है जिससे बाड़ आ रही है जंगली जीव विलुप्त हो रहे हैं और जो अभी हैं वह जिन्दा
 रहने के लिए संघर्षरत हैं  क्या हम मानव ने अपने स्वार्थ हेतु जंगल पहाड़ जंगली जानवरों के साथ अच्छा किया हैं आप सब कमेंट कर के अपनी राय दिजिएगा ।।

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यह लेख एक १०० साल के अन्तर पर आधारित है हमने इस बीच जल जंगल जमीन पहाड़ पेड़ पौधों को नुक्सान पहुंचाया है ।

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दो गज कि दूरी

यूं  सेठ लछमी चंद को रूपयों पैसे कि कोई भी तंगी नहीं थी भगवान का दिया हुआ सब कुछ था दर्जनों  कारे  बंगले थे हजारों  करोड़ रुपए कि (रियल एस्टेट) कम्पनी के मालिक थे  अनेकों शहरों में व्यापार फैला था सेकंडों नोकर चाकर थे पावर इतना कि बढ़े बढ़े मंत्री चाय पीने को आते थे उच्च पदों पर बैठे सरकारी मुलाजिमों से अच्छा यराना था ऐक फ़ोन पर फाइलों में साइन करा लेने का अधिकार रखते थे वो बात अलग थी कि सेठ समय समय पर अपनी यारी नोटों के बंडल भेंट रूप में देकर निभाते रहते थे  खैर पैसे से कैसे पैसे बनाए जाते थे उन्हें हर गुर बखूबी आता था सेठ जी कि उम्र लगभग साठ साल के आसपास कनपटी पर सफेद बाल थुलथुल शरीर गोरे चिट्टे मध्यम कद चेहरे पर तेज पर शरीर में बहुत सारी बिमारियों ने बसेरा कर रखा था जैसे शुगर ब्लेड प्रेशर गैस आदि आदि फिर भी दिन भर भागदौड़ कर रात्रि  दो बजे तक हिसाब किताब में ऊलछे रहते थे यू तो एकाउंट को सम्हालने वाले सी ऐ भी थे पर उनके ही हिसाब किताब को चेक करते थे विश्वास अपने रोम पर भी नहीं था  अर्धांगिनी कभी कभी टोकती तब यू कहकर टरका देते कि बस अब आख़री साल ...

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