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Showing posts from 2023

उमरिया का अमल

 लिखना पड़ना जानना समझना याद रखना फिर उस पर अमल करना टेड़ा सवाल है हम लिख सकते हैं हम पड़ सकतें हैं समझ सकते हैं पर अमल करने वाले बात पीढ़ी दर पीढ़ी उपेक्षा कि शिकार हैं इससे क्या लिखना  क्या समझना क्या पड़ना क्या जानना क्या याद रखना सब बकवास हो गया है । उमरिया कैसे गुजरी कब और कहां से गुजरी यह तो उमरिया कि डायरिया  ही बता सकती है पर यह सच है कि उमरिया तो आधी गुजर गयी शायद आधी रह गई पर आज इस समय  इस और इसे देखने कि इसे जानने कि  हमें फुर्सत नहीं है  सब उमरिया गुजार दे रहे पर अपने मन के मकड़जाल में माया रानी के नखरों और तेवरों के  दुश्चक्र में फंसे सुन्दरता के आकर्षण में खोए ममता मोह स्नेह जैसे बेफजूल पहाड़ों जैसे घाटियों में कि ढलानों में  चढ़ते उतरते उमरिया गुजर जाती मौत आ कर सामने खड़ी हों जाती तब उमरिया साथ छोड़  आगे और आगे बड़ जाती रह जाता केवल जीव  वे इनद़ीया  जिनके सहारे अगला  सफर काटना  ऐक और फिर ऐक और उमरिया का सफर ।।

न.....ही

अरे ओ विधाता अरे ओ दाता अरे ओ मेरे जीवन के श्रेष्ठ अनमोल रत्न जरा सुन क्या कह रहा मेरा यह मन कल तेरी अचानक बगैर किसी आभास के एक अनजानी अनदेखी अनसुनी हृदय को तार तार कर झनझना देने वाली तेरी संगीत मय अति सुरेली अति पावन आवाज जो औरों कि चीख सी लगी पर तुम्हारी चीख मय न...ही मेरे मन मेरे तन मेरी आत्मा को इस प्रकार तृप्त कर दिया मानों सदियों का प्यासा पपीहा स्वाति नक्षत्र में अपनी प्यास बुझा पाया। हारा थका सा मन दिन भर का भूखा-प्यासा तन ऐसे शान्त हो गया ऐसे भर गया जैसे अब कुछ आवश्यकता ही न रही हो जाने आज पराये नव घर में तेरी उपस्थिति पा तेरा आदर देख में ऐसे भागा मैंने सब वह किया जो में नहीं कर सकता था तेरे कारण वहां लोगों ने ज्यादा जाना ज्यादा पूछा तो वो में था क्यों कि उस दिन में भूल गया था कि मैं हूं भी मुझे सिर्फ तेरा हा तेरा ही ध्यान रहा वहां सैकड़ों आए गये पर तेरे अलावा वहां कोई नहीं दिखा न जाने कितनी बातें वहां होई होंगी कितनी बातें उठी होगी पर तेरे मुखारविंद से निकली न....ही के अलावा मैने कुछ नहीं सुना जब वहां से चला तब तेरे अंतर में बसी तेरे मुख से निकली न...ही  ऐक अनजानी अनदेखी ...

निराला प्यार

 प़भु तेरी प़ेम भरी मुस्कान से तेरी प़ेम से भरी जवान से में हृदय से धन्य हो गया चाहें जब चाहे जहां सुन्दर सुहावने स्वप्न में खो गया यदि तू नहीं होता ये तेरा स्नेह नही होता कब का हार गया होता कब का इस नश्वर संसार से मुंह मोड़ कर चला गया होता ओ प़भु यहां तो सब कुछ धोखा हैं सारे संबंधों ने जबरदस्ती  किन्हीं स्वार्थों के खातिर रोका हैं में इन सब को तेरे कारण जान गया  पहचान गया । और सिर्फ सिर्फ तुझे अन्तर मन से मान गया क्यों कि तूं ही इन सभी में यत्र तत्र आकर कभी परेशान कर  कभी संतावना दे शब्दों से तसल्ली बांधता है कभी दोस्त बन सारे जीवन  साथ देने का यकीन दिलाता है  कभी कहीं कमी नहीं तू ही जब चाहे किसी भी रूप में मिल कर मुझे मेरी राह में नित नूतन आंनद बिखेर चल देता कभी मुझे तू रोकता नहीं कभी मुझे तू टोकता नहीं  कभी मुझे तू बांधता नहीं  हमेशा स्वतंत्र रखें हैं  और हमेशा तूं हमारे लिए पलकें  बिछाए  इन्तजार करता है  में जान गया पहचान गया कि  तू और मेरी आत्मा  मेरा अन्तर मन ऐक ही है  और तू ही केवल तू ही  मुझे अनोखा प...

बांस मिरे में कुनडवा

 हाथ पांव का अभाव इन झाड़ो को हैं सता रहा अपने मिट जाने का नव भाव सता रहा तब आस्तिक हो  सबके सब प़ाथना करने लगे। प्रार्थना खाली नहीं जातीं यह सब कहने लगे आवश्यकता से जूझता उसी समय कुनडवा आया ल लहराते झाड़ो को काट काट कर मुस्कुराया भाग्यवादी पुरूषार्थ हीन नै अपने साथ झाड़ को मिटाया तभी सपूत बांस ने  कुनडवा को ललकार कर कहा बोला अब तुम मेरे करीब भटक नहीं पाओगे क्यों कि अब तुम हमें पुरूषार्थ से  विश्वास से सद्भावना से  भरे इंसान के बीच पाओगे वहां तुम्हारे जैसे छल कपट बेइमान का नामों निशान मिटा देंगे कुनडवा तुम्हारे संरक्षक तक से कह देंगे जो हम में प्रवेश कर हमारे ही साथ विश्वासघात कर चुपचाप हमारे ही दामन पर दाग लगा जातें देश में गद्दार कुल में कपूत बांस भिरे में कुनडवा पर हम क्या सभी लजा जाते ।।

प्रकृति

 दूर धुंधली धुंधली पहाड़ी उसको चूमता आलिंगन करता आसमान। कोई कहता मुझसे उस पहाड़ी पर बैठी आत्मा लगा रही तुम जैसा अनुमान। इससे एक आवाज उठती चुपचाप अपने आप से कहतीं अपनी कल्पना पर कर न लेना अभिमान सारा जग है इसी समान ये धरती ये गगन हैं महान्। सब मिलाकर बन गये मानवता के लिए सुंदर जहान। ये लहलहाते खेत और फसल गाये बिरहा कि गारी उड़ते पंछी कि कतार दूर जा कर लगती जा रही बादल के पार सामने पहाड़ पर घने सागौन महुआ के पेड़ कि कतार यह सांवला सलोना आसमान लाल कहीं नीला कहीं भूरा कही दिखता महान प्रकृति सुन्दरी को देख  अनाड़ी मन चकित रह गया वर्णन कैसे करें प़तिपल बदलते रूप का  देखता रह जाता गूंगा बना आंखें खोलें तेरी सारी प्रकृति देखा करता अंदर ही अंदर मन हसा करता अंतर्मन में प़शन उठा करता। अन्दर ही अन्दर उत्तर भी सामने नाचने लगता तेरा तो न ओर है न छोर हैं चारों दिशाओं में बस तेरा ही शोर हैं। इससे आंखें बंद कर कानों से सुना करता मन अठखेलियां कर नृत्य नाचा करता तब तेरा ही रूप अन्तर में दिखा करता।

प्यार का दरिया कविता

 कुछ भी नहीं यहां जिसे कह दूं यह हमारा है सोचा था कभी दिल है मेरा आज वह भी तुम्हारा हैं। औरों का दिया हुआ नाम नहीं लगता यह प्यारा है। नफ़रत है मुझे उससे अंहकार का जो सहारा हैं। प़तिपल अंतर कहता  सिर्फ तू केवल तू हमारा है यह सुन यह जहां करता उपहास हमारा है।। आज से कहा सदियां से तुमने हमें तड़पाया है। रोम रोम में बस तेरा वो रूप भर समाया है। प्यार शब्दों से कैसे किया जाता है शब्दों में अक्सर झूठ भी आ जाता है प्यार तो सत्य का स्वरूप कहलाता है  प्यार तो अपने आप हो जाता है अन्तर में विकसित हो मौन कर जाता है कर्म सिर्फ कर्म करने को कह जाता है। ऐक दूसरे को देख परमानंद को पा जाता है बाकी सारे जग को परमात्मा बनाता है सारी दुश्मनी को मिटाकर प्यार आ जाता है अंहकार हीन बना नफरतों को मिटाता है मन ही मन बहुत कुछ समझा जाता है कोई करता नहीं यह सब अपने आप हो जाता है बदले में तुम्हारे ये संसार हुआ ये हमारा है। धरती मां रोज कहें तूं मेरा राज दुलारा हैं ये सागर की लहरें कहें मेरा आंचल तेरा सहारा हैं। गंगा जमना यै कहें तूं संगम का किनारा है तेरे बिना दीन हुआ दीन बंधु का प्यारा हैं तेरी दी मुस्...

दर्शन अध्यात्म कविता

मन्दिर रोज जाता रोज रोज दर्शन करता दिन हो या फिर रात जब समय मिलता जितने देबी देवता दर्शन देते मे अपलक देखता आनंदित हो अपने आपको न जाने कितना सौभाग्य शाली समझा करता और आज जब मन्दिर से दूर हो गया तो दिन भर रात भर ऐक रट रहा करती कि किसी तरह एक पल के लिए दर्शन हो जाए पहुंचता हूं  दूर से मन्दिर देख मन में और तन में  अपार हर्ष छा जाता फिर खोजता आराध्य को मिल जाते दिख जाते तब मैं सारा विषाद सारा थका देने वाला इंतजार भूल ऐक मीठा मीठा आंनद का अनुभव करता और कभी कभी मेरे पहुंचते ही जब मन्दिर के कपाट पुजारी नहीं देवता बंद कर देते तब मेरा क्या होता मुझे क्या मिलता ऐक अनजानी आशा अनजाना विश्वास अनजानी नफरत अनजानी तड़पन जो सब मिलाकर उनका रूप अंदर मुसकुरा मुसकुरा अजीब आंनद को गद गद कर देता है  आत्मा चुपचाप कहती  बाहर कहां दर्शन करने जाते हो  हम तो तुम्हारे अंदर हैं  हम ही परमात्मा के अंश प़तिबंम हैं  इसलिए मेरी मानो अच्छा सोचो  अच्छे-अच्छे कर्म करो  फिर देखना आत्मा के अन्दर ही तुम्हें परमात्मा के दर्शन हो जाएंगे।

पहचान कविता

 सूर्य दिशा कि पहचान क्या  सूर्य उदय से है सूरज नहीं निकलता नहीं आता चांद का ही राज रहता तब क्या सूर्य दिशा कि पहचान नहीं हो पाती। प्रश्न है यह  तुम्हारे अतीत से तुम्हारे वर्तमान से तुम्हारे भविष्य से क्यों कि इसका उत्तर सर्वत्र फूलों में हैं फूलों का पराग लेते भंवरों से है कल कल बहती नदी ऐक असान लगा समाधि में बैठे पहाड़ पर है सर सर बहती हबा धक धक जलती अग्नि तारों के साथ खेलता कूदता चांद चांद के साथ आंख मिचौली खेलता आकाश नदियों कि राहें बनाने वाली पर्वत को पेड़े को हमको तुमको जो हैं सभी को अपनी छाती से चिपकाने वाली चुपचाप फूलों के बागों कि बहारों से हर्षित होने वाली वह धरती मां यह सब साछी है हमारे प्रश्न के भी उत्तर के भी  साछी यही होंगे।

प़ेम के दो शब्द अध्यात्म कविता

 प्रभु कब करोगे कृपा मुझ पर कब कब तड़पा तड़पा मेरी भावनाओं को तपायोगे झुलाते जाओगे कब तक मेरे नयन को रोज अपनी तरफ अपने दर कि तरफ शुवह शाम दोपहर  आधी रात तुम रहो या न रहो  फिर भी देखने को वाट जोहने को छटपटाहट को मजबूर करते रहोगे कब तक मुझे देख मेरी टेड़ी मेंडी पागलों सी सूरत देख  दिवानगी देख  मुसकुरा मुसकुरा कब तक भ़मओ को भंवर में बहायेंगे आसमान देख देख  और आसमान पर तुम्हें देख देख बहुत वक्त हो गया प्रभु यह जर जर शरीर इन्तजार कर थका थका सा न जाने कब से  तुम्हें तुम्हारे भक्तों कि आवाजें मुस्कुराहटों को देखकर उबा नहीं आशा विश्वास के बादल मन में तन में छाए हैं जा रहें हैं जी चाहता है मन चाहता है और आत्मा चाहतीं हैं कि सिर्फ ऐक बार उपर से अपने आसमान से नीचे आओ करीब से देखो  इस दिल को इस शरीर को  इन भावनाओं को जो सिर्फ तुम्हारे लिए तुम्हारे दो शब्दों के लिए अपना सबकुछ न्यौछावर करने को तत्पर है। उतरो प़भु थोड़ी देर को सही आओ मिलों बात करो और चल दो  बस दो शब्द ही आपके मेरी जिंदगी गुजारने केलिए पर्याप्त हों जाएंगे  इन दो शब्दों के बल पर में...

अपनी पहचान

 सूर्य दिशा कि पहचान क्या सूरज के उदय होने से हैं सूर्य नही निकलेगा न ही सुबह कि लालमा रहती तब क्या चांद का राज ही रह जाता क्या सूर्य दिशा का पता ही नहीं रहता प़शन है आपसे आपके अतीत से आपके वर्तमान से आपके सुनहरे भविष्य से  जिसे आप संजोए हुए है  सुखद स्वस्थ भविष्य कि कल्पना संजोए हुए है । लेकिन आप दिशा हीन है  मतलब क्या करें कैसे करें  तय नहीं कर पा रहे हैं  तब मैं आपको बताऊं  उसका उत्तर प्रकृति के पास हैं  जैसे कि पर्वत, उसके ऊपर  लहलहाते विशाल पेड़  सागौन , और अन्य  उनके आस पास कुछ छोटे से फूलों के पौधे जिन्हें कहते हैं जंगली  जिस के फूलों से मधुमक्खी लें  जाती है पराग  और हमें देती है मीठी मीठी सी शहद  कया उस मधुमक्खी को दिशा का  पता हैं  जी नहीं  वह तो अपने अतीत को  जिस छतता में उससे जन्म लिया  जिस समूह ने उसे पाला  उसे तो उसका पता हैं  वह सूर्य दिशा को नहीं जानती  फिर भी वापस घर पहुंच जाती है । क्या आपको पता है कि नदी नाले  जंगल पहाड़ को काटकर अपने जन्म दाता समुद्...

शब्दों का व्यापार लघु कविता

 अब तो बस शब्दों का व्यापार है। सत्य असत्य का शब्द ही आधार है।। शब्दों से भरी हवाएं चारों ओर वह रही है शब्दों से भरे अखबारों कि रद्दी बिक रही है शब्दों से न जाने कितने वादे किए जाते हैं पूरे न किए तब शब्द ही माफी मांगते है शब्दों को ओढ़ अनेकों प्रतिभाएं चल रही है कर्म से नाता तोड फलफूल रही है  शब्दों से लोग अपनी योग्यता बताते हैं दोस्त अपनी दोस्ती शब्दों से आगे बढ़ाते हैं और तो और शब्दों के बल पर प्यार हो जाता है इन्हीं शब्दों से नवयुवक नवयुवती का संसार वस जाता है शब्दों कि संवेदना न जाने कितने को जोड़े हैं  शब्दों कि बरसात न जाने कितने को तोड़ें है शब्दों के बल पर नेता अभिनेता रोजीरोटी धन कमाते हैं पर कवि लेखक शब्दों को लिखकर बेवकूफ कहलाते हैं नेता अभिनेता दो शब्दों को कह गृहप्रवेश दुकान का उद्घाटन करते हैं भाईसाहब दुनिया शब्दों के घेरे में चल रही है। आत्मा को परमात्मा से दूर कर तेरा मेरा संजोए हुए है और तो और धर्म भी शब्दों में कैद हैं  कुछ पाखंडी हर धर्म शास्त्री शब्दों को तोल कर दुकान चला रहे हैं  शब्दों को चांदी विन शब्दों को सोना कहा जाता है परन्तु सोना छो...

गीत गाता चल अकेला

 लो मेरे मीत हो गया यह जहां तुम्हारा छोड़ा यह झौपड़ी तुम्हारा जो बना था बसेरा हमारा में न लोटू अब यहां बस दुआ देना ही फर्ज तुम्हारा सबकुछ लूट गया अब क्या हैं न्यारा न्यारा किसे दूं दोष यहां दोषी हैं मन हमारा मेरे जज़्बात मेरा प्यार मेरे हालात ने मारा हैं  यह हृदय तेरा था बेगानो ने लूटा सारा पग पग जमाने ने मुझे ही तो लूटा सारा हर पग जमाने ने मुझे ही तो दुत्कारा  रोज आया तेरे दर पर  खामोशी ने मुझे फटकारा मिलन से हमारे बस दुश्मन होगा जग सारा इससे में चलता हूं इसी में भला हमरा खामोशी या मौत बस मेरा बनेगा सहारा  गंगा सा गीत गुनगुनाते भी न जग सुनें तुम्हारा। आज से कहां सदियों से बस तुम्हारा इंतज़ार है  एक तू है जो मुझे मिटाने को तैयार हैं तेरी राह देख देख नयन ये सरमा जाते हैं मन ये कुन्दन करता हम पागल से नजर आते हैं जानें क्या क्या त्याग कर तुझे में पुकार रहा तेरे सिर्फ़ तेरे लिए जग को ललकार रहा। तुम आओगे कब  यही गर पता होता  इन्तजार में ही तब जानें कितना मज़ा होता तेरे न मिलने से निर्धन नजर आता हूं इसी से अपनें दोस्तों कि उपेक्षा भर पाता हूं फिर भी उन्...

मनमोहकता छोटी कविता

 तुम कितने पास आ गये हों तुम्हारी निकटता में  जितना उत्कृष्ट निश्छल प्रेम का अभाव हो रहा है तुम प्रेम हों कि परमात्मा योगी हों कि भोगी हो नर हो कि नारायण हों क्या हो तुम मेरी समझ में नहीं आता यह समझ हर पल धोखा देने को तत्पर है फिर भी तुमने इस समझ कि कमजोरी को जीत लिया है समझ के भेद विलीन हो गए हैं तुम जो हमारे निकट आ गये हों तुम्हारी नजरे हमें कृपा दृष्टि बन आनंदित करती है तुम्हारी मुस्कान हमारे क्लेशों को मृतवत करने का आवाहन हैं तुम्हारी मधुर अमृत वाणी हम पर वरसती है तो हमारे कानों से  हमारे रोम रोम को रोमांचित कर सार्थकता का बोध देती है । तुम कोन हो कोन सी शक्ति से कोन से अद्भुत सौंदर्य से तुम सत्य कि परिभाषा लिखनें को तत्पर हो तुम हम जैसे अभागों के जीवन में भाग्य बन उदय हो रहे हो  तुम्हारी निकटता का बोध हमें एकान्त में रह  तुम्हारे उन सत्य पर विचारने को कहता जो तुमसे एकाकार हो गये है तुम्हें अपनों पर आंनद भरा गर्व है तुम्हारी चाल में अनोखी अल्हड़पन है तुम्हारे स्वभाव में मनमोहकता है  तुम्हारी दृष्टि से आंनद बरसता है वह आंनद तुम्हारे साथ रह कर एकान्त में ...

शांती निकेतन मनमीत कविता

 मन उड़ उड़ वहां जाता पहुंच कर वहीं के गीत गाता सुबह शाम अंधेरे में उजले में,रात में अकेले में नहीं घबराता वहीं पहुंच जाता और ऊंचे ऊंचे पहुंच, गमलों में क्यारियों में खिलते फूलों के साथ घूमते भंवरों के साथ मस्त हों नाचने लगता गाने लगता तब इसी नाच गाने के बीच मन को मनमीत के पद चाप सुनाई देते तब और तेज गति से और तेज आवाज में नाचने और गाने लगता जब मन मीत सामने मिल जाते तब यह पापी मन नाच गाने बंद कर चुपचाप यह अलौकिक रूप व अलौकिक आनन्द आत्मा कि और पी पी कर उतारने लगता ऐक टक अपलक निहार निहार अनोखी लगन से  यह अनोखा स्नेह मन का उनके लिए बेहाल बन जाता तब मीत चल देते मन आत्मा कि लगन से घबराकर और मन आत्मा से बात कर पुनः अनोखी मुस्कुरा हट से नाचने लगता धूम मचा देता मन दिल दिमाग में एक अनोखा आनन्द जिसकी कल्पना करना लोहे के चने चबाना जैसा औरों को जो यह मन रोज रोज नए नए हट कर लूटा करता चुपचाप ऐक अंजाना शांती निकेतन का निर्माण इस मिट्टी के तन में किया करता।।

बड़ा दिन कविता

 आज तो बड़ा दिन था  पर पता नहीं चला बिना हलचल के ही गुजर गया रोज कि भाती सूरज उषा के साथ फाग खेलता आया संध्या के साथ आंख मिचौली करता चला गया चतुर्थी का चंद्रमा उभरा अपना शीतल प्रकाश बिखेर चल दिया तारों कि बारात आकाश में उतर मोन दर्शक बन चहुं ओर बिखर गई रोज कि भाती लोगों कि भीड़ अपना अपना कर्म कर सो गई पंछियों के समूह प्रभात के साथ कलरव का गान कर संध्या आते गुनगुनाते चहचहाते पंखों को फड़फड़ाते घोंसलों में चलें गये  हर दिन बड़ा दिन ऐसा कहते हमें समझाते गये।।

ससुर जी का दूसरा विवाह समाजिक कहानी

 आजकाल नीता ससुर जी के व्योहार में अलग तरह का परिवर्तन देख रही थी जैसे कि जब वह किचन में खाना पकाने में व्यस्त रहतीं तब अनावश्यक ही वह किसी न किसी बहाने से आ जाते व जब वह बाथरूम में नहाने जाती तब उसे लगता था कि जेसै कोई दरवाजे कै ऊपर लगे रोशन दान से झांकने कि कोशिश कर रहा है व जैसे कि जब वह पति के साथ अंतरंग पलों में होती तब खिड़की के पास कोई खड़ा होकर अन्दर के दृश्य को देखने कि कौशिश कर रहा होता हालांकि उसने यह सब अपने मन का बहम समझ कर दिमाग से निकाल दिया था परन्तु हद तो तब हो गई थी कि वह बेडरूम में कपड़े बदल रही थी तभी ससुर जी ने गेट को हल्का सा धक्का देकर अन्दर झांका था उसने हड़बड़ी में बैड सीट से अपनी देह को ढक लिया था वह कुछ छड़ों के लिए किरतबय मूड होकर खड़ी रह गई थी खैर कुछ देर बाद कपड़े पहन कर वह डाईंग रूम में पहुंची थी ससुर जी टेलीविजन पर समाचार देख रहे थे उसने कहा कि आप को कुछ काम था क्या आप को दरवाजा खटखटा कर आना चाहिए था में कुछ दिनों से आप के अजीब व्यवहार को देख रही हूं छी छी आपकों शर्म भी नहीं आतीं ऐसी छिछोरे पन दिखाने में मैं आपकी बहू हूं और बहू बेटी के समान होती है स...

चांद और आकाश का प्यार

 सूने आकाश में जब चांद का आगमन होता तब आकाश सौभाग्य शाली हों उठता और गर्व के साथ सीना तान कर बड़ी विनम्रता से कहा करता हम फिर धन्य हो गये  हमारे धीरज ने हमारे विश्वास ने  हमारे आत्मिय प्रेम ने  चांद को मजबूर कर दिया मेरे जैसे काले से भूरे से नीले से  टूटे फ़ूटे बगैर नीव के बगैर सहारे के बेकार से शून्य से  बनें हमसे चांद को मिलने को  और तो और यह भी सुन लो जब चांद आकाश से रूठ कर चला जाता जब भी दुबला पतला हो आ जाता तब यह आकाश रोज नीरवता में चांद को तड़प तड़प कर अपने दामन में लगे गहरे घाव बताता जो न जाने किन किन ने  प्यार और विश्वास के  नाम दिए हैं और जब आकाश कह उठता कि यह घाव भी बहुत प्यारे लगते हैं तब वह चांद जिसे सारा संसार प्यार करता हैं पर गले लगाने को गीत बनाने को त्याग नहीं करता तब आकाश का हौसला जान खुश हो कर कहता मेरे प्यारे आकाश में भी बहुत धोखे खा चुका इस संसार में बहुत कुछ गंवा चुका पर न जाने क्यों तुम्हारा निश्छल प्रेम देख तुमसे मिलने को तुम्हारे साथ रहने को बार बार कहता हैं इससे तुम्हारा विराट त्याग तुम्हारा निश्छल प्यार रोज तुम्हारे...

मजबूर संध्या

 संध्या आ गई पर आज सुहागिन नहीं है आज उसके चेहरे पर मुस्कान भरी लालिमा नहीं है  आज तो इन अभिमानी बादलों ने  तूफान और मेघों को न्योता देकर बुला लिया  संध्या बेचारी को मेहमानों के स्वागत में लगा दिया  उसे आज श्रंगार नहीं करनें दिया  उसे अपने प्रीतम सूरज से नहीं मिलने दिया  पिया बगैर श्रंगार वह कर भी लें  वह सम्मान स्नेह नही पाती  उसके प्रीतम के इन्तजार में अपने मकान मालिक बादल के इशारे पर जी जान से लगी रही  वह सोचती रही अगर इनकी नहीं मानूंगी तब  यह इन दुश्मनों को भी यही रखेंगे  और हम जैसी सुहागिनों को  जानें किन किन घर  संदेहों के बीच अर्ध के अभाव में  आवास के चाव में  अपने अपने प्रीतम से दूर करेंगे ।

मेरा गांव कविता

 मेरे गांव तुम जब आओगे तब वस गांव को देखते रह जाओगे फिर तुम्हें गांव से लगे पहाड़ पर लें चलुंगा वहां से दिखाई देंगे हरे भरे खेत सामने कल कल करती वहती नदी  दूसरी ओर भरा सरोवर  हमारे गांव के छोटे छोटे कच्चे पक्के घर  उनके आस पास घूमते फटे कपड़े में घूमते  मेहनत कश नर  सुबह जब आप हमारे साथ घूमने जाओगे  तब उषा कि लाली  दिल खोलकर आप का स्वागत करेगी गांव की गरीबी कबाड़ पिछड़ा पन अ शिक्षा तुमसे सवाल करेगी  दिन रात श्रम को समर्पित फिर भी अभावों के बीच गुजरती जिदंगी  तुम्हें सोचने को बाध्य करेगी ।

तारों का उदय

 ऐक तरैया पापी देखें दो देखें चांडाल तीन तरैया राजा देखें  फिर देखें संसार सांझ के वक्त में रोज  ऐक तरैया देख  पापी बनने का सौभाग्य पल भर को सही कर पाता हूं । जल्दी ही नज़र घुमा कर  दूसरी तीसरी कि तलाश  शुरू कर देता हूं । मन चाहता है कि दो तारें  ऐक साथ नज़र आए  तब चांडाल होने से  बच जाए  पर चांडाल भी रोज बनना पड़ता  अपने आप को ही अछूत  समझना पड़ता । फिर विचार आता मन अकुलाता तीसरी तरैया को देखने  सारे आसमां में नजर घुमाता  लेकिन वह तारा नजर नहीं आता  में चांडाल बना रहता  न जाने क्यों रास नहीं आता तभी तीसरी तरैया  नजर आ जाती  राजा बनने कि अस्पष्ट रेखा अधर पर छा जाती  कोई पास होता तब उसे या अपने को  मेरे राजा बनने कि कहानी बतलाती कहती तीन तरैया राजा देखें फिर देखें संसार  तभी कहें सुनने वाला  जरा ऐक नजर आसमां पर डालो  फिर इठलाना कि तुम राजा बाकि सब संसार  ऊपर नजर डाली तब अनगिनत तारें नज़र आए  राजा मिटा फिर अनन्त के बीच खड़ा कर  अंहकार हीन सभ्य नागरिक बनातीं...

चित्रकार कविता

 तुम चित्रकार हों कोई कहता तुम कलाकार हो कोई कहता तुम अदाकार हो कोई कहता तुम संसार का सार हो में तो तुम्हें चित्रकार जानता  इसी से अपना मानता इसी से में तुमसे नहीं डरता  चाहें जब तुम्हारे ही पीछे पड़ा रहता देखता हूं कि तू अप भीनी करूणा  दोनों में बहाता हैं  उनको मुस्कुराते देख खूब मुस्कुराता हैं  अपना चित्र उनके हृदय में बसा देता  उसके चित्र तू दिल में छिपा लेता ।। तुम चित्रकार हों चित्र वना बना  चितेरे हों गया हो  न चाने कितने चित लूट  चिन्त के लुटेरे हों गये हों  पर हों निराले  क्यों कि कला के बदलें  धन नहीं लेते  मन के आशिक प्रेमी भिखारी वन  तन मन मांग लेते  जो देता उसे भेंट में अपना चित्र दे देते  कभी कभी चित्र के साथ तुम खुद चल देते  परवाह नहीं करते अपनी हैसियत का  सब कुछ लुटा देते  पर हम अभागे अपना मन भी नहीं देते ।।। तुम चित्रकार हों  इससे रात दिन  अपने कर्म में लगे रहते  चित्र वना बना कला कि पूजा करतें  सालों रहते पास पर मोन ही बने रहते  आंखों ही आंखों में...

गायों का झुडं

 गायों का  झुडं  जब   टुन टुन धुन  धुन  किढ किढ   सुन सुन  की अनोखी आवाज   करता  एकाएक सामने आ गया  । तो काफी देर तक   ईस अनोखे समूह को  मे  एकटक   देखता  रह गया  ।। तभी  भोला भाला  बरेदी   अनोखी  आवाजे गायो को  देता   हँसता मुसकुराते चिल्लाता दौडता  पास से  गुजर गया  उसका मुसकुराहट से भरा  चेहरा  उसका संतोष  उसका गायों के प़ति स्नेह  देख में ठगा सा  रह गया  पुनः उसी  अनजाने  संगीत में  ऊनही आवाज में  भागत उछलती  चुपचाप घास  चरती   आपस में  फूसती  सिर लडाती  जुग आली कर रभाती गायों के  झुंड को  देख  कर्मयोगी   कृष्ण कि  याद कर हृदय पुलकित पुलकित हो गया । गायौ के  झुंड को  देख   अचानक गोकुल के गवाल  द्वारका के  राजा  गोपियों के कन्हैया  महाभारत में अर्जुन को कर्म का मरम...

तू अध्यात्म कविता

 तू रोज चाहे जब  क्या बजाता है   कौन सा  राग  छेड देता  कोन से कलाकारों को  ले  मंच पर अवितरित हो नित नुतन  संगीत कि  धुने  बजाता है   कभी भी  तेरे  कलाकार  थकते नहीं   रात दिन  तू  अपने इसारो पर   तू  इनहें  चला रहा   न जाने कितने अकेलो को   तू  अकेला  भरमा  रहा   तेरे ही  स्वर  राग  बन  वह  रहे  हैं  तेरे गीत  हमसे  कुछ कह  रहे है ।।

दादी कि सूझबूझ

  भोर का समय था दूर कहीं मंदिर कि घंटि के साथ शंख कि आवाज आ रही थी उसके कुछ ही देर बाद कहीं दूर मुर्गा बाग लगा रहा था जिसकि आवाज रेल गाडी निकलने कि छप छप अवाज से दब रही थी शायद कोई मालगाड़ी निकली थी ऐसे ही समय में सुरभि पति कि छाती पर सिर रखकर नींद के आगोश मै खोई हुई थी पति कि सासो लेने से उसका सिर भी छाती के साथ उपर नीचे हो रहा था फिर भी वह निश्चित होकर सो रही थी चूंकि सुरभि पुलिस अधिकारी थी डयूटी से देर रात वापिस घर आई थी तभी तो घोड़े बेचकर पति के आगोश के सहारे घोड़े बेचकर सो रही थी तभी मोबाइल फोन कि घंटि बज उठी थी पति ने सिरहाने के पास छोटी सी टेविल थी जिस पर मोबाइल रखा हुआ था हालाकि सुरभि ने पति को निर्देश दे कर रखा था कि संगे संबंधियों का कभी भी ऐसे समय में फोन आऐ तब रिसीव कर लीजिये वरना नही पति ने आंख मिचमिचाते हुऐ नम्बर नाम देखा था फिर हैलो हैलो कह कर जी कहिए सुरभि अभी नींद में हैं ओह हां हां जी मे उसे अभी नहीं कहूंगा हा ठीक हैं आने वाला कॉल सुरभि कि मां का था चूंकि सुरभि कि दादी जिंदगी कि सफल पारी खेलकर अंतिम सफर पर हमेशा हमेशा आसमान में तारो के पास चली गई थी या फिर आत्मा क...

दादीजी का चश्मा

 जब जब दादी ने अपने चश्मे को नाक पर रखा तब परिवार में बड़ा भूचाल आया था उस भूचाल को दादी जी ने अपनी सूझबूझ से हमेशा हमेशा के लिए परिवार से वाहर कर दिया था ठीक हैं कुछ साल से दादी जी ने अपना चश्मा नाक पर नहीं रखा था इसलिए सारा परिवार खुश था परन्तु अभी कुछ दिनों से उनहोंने फिर से चश्मे को नाक के मध्य भाग में रखकर सभी परिवार के सदस्यों को देखना चालु कर दिया था तब से परिवार मे भय का माहोल था हालाकि दादी कि उम़ सौ साल के पास थी इस उम़ में भी दादी जी से सारा परिवार डरता था कारण यह था उनका कठोर अनुसासन जैसे कि भोर के समय पर सभी परिवार के सदस्यों को नित्य कर्म से निर्मित होकर बाहर टहलना ताजी हवा फेफड़ों मे जमा करना और फिर चाय के पहले दूध में बासी रोटी खाना फिर चाय या काफी पीना नहाने के बाद घर के छोटे से मंदिर में सभी को ईश्वर कि आरती करना फिर नाश्ता कर के परिवार के सभी सदस्य अपने से बड़े के पैर छूकर घर से काम पर जाना उनका यह आदेश उनके दोनों पुत्र उनकी पत्नी पिछले चालीश साल से मान रहे थे बडा बेटा अभी 75 साल में था छोटा तीन साल छोटा फिर उनके बच्चे कुलमिलाकर परिवार में बीस सदस्य थे सभी सदस्य ...

डबल बेड

 वह भादो माह कि काली रात्रि थी आसमान में मेघ भीषण गर्जन करते हुए धरती पर कभी तेज तब कभी धीमी गती से पानी कि धारा बूदो के रूप में बिखेर रहे थे कभी कभी हबा भी तेज गति से पेड़ पोधो को परेशान कर रही थी व कही दूर मेंढक, झींगुर कि टर टर सी सी कि आवाज आ रही थी कालोनी के पास कही कुत्ते सामूहिक रुदन कर रहे थे जैसे की मानो बे सब मिलकर कह रहें हो कि हे मानव हमारे पूर्वजों ने तुम्हारे जीवन जीने के लिए अपने पचचीश साल भगवान् से प्रार्थना कर तुम्हे दिए वह इसलिए अपनी आयु से दिए थे कि हे मनुष्यो तुम्हारी बढी हुइ आयु से हम मुक को खाना रहना, मिलता रहेगा अरे अब देखो तुम सब अपने अपने घरों मे पलंग पर रजाइ मे दुबक कर नींद में मस्त हो कर पडे हो और हम ऐसी वारिस में अपने छुपने का स्थान खोज रहे हैं हे मनुष्यो हमे तो तुम्हारे पोर्च में जरा सा जमीं का टुकड़ा चाहिए था बदले में तुम्हारे घर कि रखवाली फ़ी में हो जाती फिर कहते हो इंसान का सबसे अच्छा दोस्त कुत्ता होता हैं अरे भला बताऐंगे हम ने दोस्ती वफादारी निभाने में कहाँ गलती कि थी बेघर कुत्ते सामूहिक रूप से रो कर अपना दर्द बता रहे थे । ऐसे ही मौसम में युवा स्त...

कमली कि व्यथा

 वह एक वर्षांत कि रात्रि थी आसमान में मेघ ढोल नगाड़ों के साथ उत्पाद मचा रहे थे रुक रुक कर बिजली चमक रही थी बादलों के गर्जन से चारों दिशाएं कांप रही थी दूर कहीं बिजली गिरी थी उसी के साथ बिजली चली गई थी शायद कहीं तार फाल्ट हों गये थें तभी तो सारा शहर अंधेरे में डूब गया था ऐसे ही रोमांटिक मौसम में कमली पति के साथ चिपटी हुई थी सांगवान का पलंग थर थर कांपे जा रहा था कमरें के अन्दर के वातावरण में गर्म गर्म सांसें टकरा रहीं थीं कामुक सिसकारियां निकल रही थी वह चरमोत्कर्ष पर पहुंची भी नहीं थीं तभी दरवाजे पर दस्तक हुई थी जो बार बार खोलिए कोई कह रहा था कमली ने पति को अलग किया था फिर दिया सलाई अंधेरे में खोजकर मोमबत्ती जला दी थी देह पर मैक्सी पहन कर दरवाजा खोल दिया था दरवाजा खुलते ही पुलिस एक झटके में ही घर के अंदर दाखिल हो गई थी टार्च कि रोशनी से घर का हर कोना अलमारी संदूक खंगाले जा रहे थे कमली समझ नहीं पा रही थी कि यह सब क्या हो रहा है उसने पुलिस इंस्पेक्टर से पूछा था साहब यह तलाशी क्यों ? तेरे पति ने बैंक में गबन किया हैं ऐसा कहकर वह बैडरूम में दाखिल हो गया था बिस्तर पर लेटा हुआ पति जिसने अप...

वफादार पत्नी

 संध्या का समय था वातावरण में कोहरा छाया हुआ था ठंड में हाथ पैर कंपकंपा रहे थे किसान अपने खेतों के काम निपटा कर मवेशियों को लेकर घर लौट रहे थे गोधूलि आसमान को छू रहीं थीं परन्तु कोहरे के कारण दिखाई नहीं दे रही थी गाएं नवजात बछड़े को दूध पिलाने के लिए व्याकुल होकर आवाजें लगा रही थी ऐसे ही वातावरण में रूपा अपनी मां के साथ खेतों का काम निपटा कर आ रही थी खेतों के नाम पर थोड़ी सी जमीन थी जिसमें सब्जी लगाकर बाजार में बेचकर गुज़र बसर हो रहीं थीं कुछ बकरियां थी एक गाय थी जीनका दूध वेचकर आजिविका के लिए कुछ सहारा मिल जाता था खैर रूपा से उसकी मां ने कहा था वेटी जल्दी जल्दी चल लगता है कि वारिस आएंगी यह बीन मौसम वारिस फ़सल को नुक्सान पहुंचा कर ही दम लेगी वह बड़बड़ाने लगी थी । रूपा बहिन भाई से बढ़ी थी जन्म से ही ग़रीबी उसे उपहार में मिलीं थीं माता पिता ने गांव के ही सरकारी स्कूल से मिडिल क्लास तक पढ़ाई करा दी थी उसके बाद पास के कस्बे में स्कूल था जहां भेजना स्कूल कि फीसें किताब कापी का खर्च उठाना उनकी सामर्थ से बाहर था तब उन्होंने रूपा को घर के काम काज खेती किसानी में हाथ बांटने को कहा था अब वह ...

मन का ख़्याल कहानी

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 कुछ दिनों से अजीत को मन में ख्याल आ रहा था कि कुत्ता पालू पर क्यों उसे समझ में नहीं आ रहा था वह बार बार ख्याल को दिमाग से वाहर कर रहा था पर वह वापिस अलादीन के चिराग जैसा समां जाता उस ख्याल ने उसकी रातों कि नींद हराम कर दी थी स्वप्न भी उसे वार वार वही ख्याल याद दिलाता और तो और जब भी वह पाखाने में पेट साफ करने के बैठता तब भी उसे वहीं ख्याल आ जाता जब वह सीसे के सामने दांतों कि सफाई करता तब भी उसे ख्याल आ जाता वह कार ड्राइव करता या मोटरसाइकिल दफ्तर हर समय ख्याल पीछा नहीं छोड़ता वह परेशान हो गया था इस विषय पर उसने पत्नी से भी सलाह ली थी कि क्यों न हम कुत्ते के बच्चे को पाल लूं परन्तु पत्नी ने यूं कह कर पल्ला झाड़ लिया था कि रहने दिजिए खुद तो सुबह जल्दी दफ्तर चलें जातें हैं और देर रात वापिस आते हैं कौन उसे वाह्य घुमाएगा कौन उसकी टटटी पेशाब साफ करेगा न बाबा न बढ़े सवेरे जागकर आपके लिए चाय नाश्ता लंच बॉक्स, बाद में बच्चों को नहलाना उन्हें स्कूल के लिए तैयार करना फिर स्कूल बस तक छोड़ना बीच के समय में घर के काम निपटाना जो भी समय बचता है दोपहर में थोड़ा आराम करना फिर बच्चों को स्कूल बस से वा...

एस्कॉर्ट सर्विस

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पिछली तीन कोरोना लहर में बहुत सारे परिवारों ने अपनों को खोया किसी ने मां को तब किसी ने पिता,भाई बहिन पति पत्नी खोने वाले लोगों का दर्द कोई भी साझा नही कर सकता जानें वाले तो चले गए छोड़ गए यादें यादें । मिस्टर अजीत नौ सेना में अधिकारी थे जीवन के अनेक वर्ष पानी के जहाज, पनडुब्बी में व्यतीत हुए थे कभी कभी तो सागर कि अथाह गहराई में महीनों पनडुब्बी में समुद्री सीमा कि निगरानी करते रहते थे तब कभी समुद्र सतह पर जहाज के डेक पर खड़े होकर दूर दूर तक समुद्र ही दिखाई देता था कभी कभी कोई नटखट व्हेल मछली असीमित जल में गोते लगाते दिख जाया करती थी तब कभी दुश्मन देश के जहाज जो अपने देश कि सीमा कि निगरानी करते थे खैर समुद्र, जहाज,का, जीवन घर परिवार से अपने आप में अलग था जहा पर कठोर अनुशासन का पालन करना होता था समय का उपयोग भी निश्चित था सहकर्मियों में महिलाएं भी थी उन्हें भी कठोर अनुशासन का पालन करना होता था। मिस्टर अजीत कुछ महीने या फिर यूं कहें कि कुछ सप्ताह ही घर परिवार को दे पाते थे हालांकि वह शादीशुदा थें जीवन संगिनी भी समझदार पढ़ी लिखी खूबसूरत थी जो दो बच्चों कि देखरेख के साथ माता पिता का भी ख्याल...