Skip to main content

Posts

विश्वास इंसान जानवर कि कहानी

<> अर्ध रात्रि का समय आसमान में तारे टिमटिमाते हुए अपनी आलोकित आभा से शीतलता बिखेर रहे थे ऐसे ही बेला में कोरोनावायरस के कठिन समय में प्रवासी मजदूरों के जत्थे भूख प्यास पुलिस प्रशासन से जूझते हुए अपनी मंजिल कि और कदम ताल मिलाकर चलते हुए जा रहे थे इन्हीं के बीचों-बीच चल रहे थे दो मुसाफिर जो जम्मू से बुन्देलखण्ड अंचल जा रहे थे जिन्होंने सेकंडों किलोमीटर कि यात्रा पूरी कर ली थी  अभी भी हजारों किलोमीटर कि यात्रा बाकी बची हुई थी चलिए आप को दोनों  इन्सानी भावनाओं से भरा हुआ स्वार्थ राग द्वेष अच्छा बुरा गिरगिट लोमड़ी  नाग जैसे जानवरो के गुणों को धारण करने वाला ख़ैर इस आपाधापी वाले आर्थिक युग में यह गुण तो लगभग लगभग-लगभग सभी मनुष्यों में समान रूप से पाए जाते हैं चलिए अब कहानी शुरू करते हैं । पड़ोसी देश कि सीमा  सेे.कोरोनावायरस ने अपनी दस्तक दे दी थी मिडिया के हवाले से वहां पर जन मानस बेहाल था कोरोनावायरस महामारी  ने अपना आवरण पूरी तरह से ओढ़ लिया था हजारों जन-मानस अनायास ही काल के गाल में समा गए थे वहां कि सरकार भी  लगभग-लगभग नतमस्तक हो कर त्राहि-त्राहि मान ...

कागजी पहलवान

सांध्य का समय था पंछी टोलियां बनाकर आपस में बात चीत करते हुए पंख फड़फड़ाते हुए अपने अपने घोंसले कि और जा रहें थें दूर कहीं पहाड़ पर सूर्य देव कि आखरी किरण अपनी आभा बिखेर रही थी ऐसे ही समय में कागजी पहलवान अपनी बुलेट मोटरसाइकिल से गांव आ रहा था चूंकि उन दिनों गांव के लिए पक्की सड़क नहीं थी सकरी सी गली थी उसी गली से गांव के जानवर जैसे कि गाय भैंस बकरी बैलगाड़ी ट्रेक्टर के लिए यहीं गली ही थी तभी तो कागजी पहलवान को संध्या समय कि ऐसी बेला में बुलेट चलाने में परेशानी आ रही थी वह कभी जोर जोर होरन बजाता तब कभी बुलेट ऐक और करके खड़ा हो जाता तभी ऐक चरवाहे ने कहा लगता है कि पहलवान कोई मेहमान आए है  हां हां भाई ससुराल से आए है पहलवान ने मूछ पर ताव देकर जबाब दिया था दरअसल बुलेट मोटरसाइकिल के पीछे कि सीट पर सुन्दर सजीला नौजवान बैठा था । हां हां भैया भौजी के तब तो भाई होंगे ही ही ही कर के हंसने लगा था  खैर कागजी पहलवान जैसे तैसे गांव के नजदीक पहुंच कर शराब कि दुकान पर रूक गया था बुलेट मोटरसाइकिल को खड़ा कर वह काउंटर पर पहुंच गया था  कहां से आना हो रहा है पहलवान सेल्समैन ने पूछा था ...

तुम कहां हो

 तुम कहां हो? कहां नहीं हों ? दोनों अनंत काल से चले आ रहें शाश्वत प़शन है इनके उत्तर भी अनंत काल से  शाश्वत हैं। प़भु के बगैर होना तो दूर कल्पना भी संभव नहीं तुम सर्वत्र हो प़भु कण कण में समाए हों प़भु तुम यहां भी हों वहां भी हों आपके बिना कहते हैं कि  पत्ता भी नहीं हिल सकता मंद मंद शीतल पवन नहीं वह सकतीं कल कल करती नदियां नही बह सकतीं हिलोरें मारकर विशाल सागर  अपनी सीमा में नहीं रहता न ही सूर्य अपनी तपिश बिखेर कर हमें रोशनी देता न ही चांद दीए जैसी रोशनी से हमें  शीतलता देता  पूछता हूं प़भु तुम कहां हो। हे प्रभु जब से हम मानव कि अगली पीढ़ी से लेकर  आखिर पीढ़ी तक यह प़शन हमें तबाह किये हुए हैं  बर्बादी के द्वार पर खड़ा किए हुए हैं हे प्रभु प़शन अटपटा सा है पर शब्दों कि गूंज उत्तर के रूप में होती है पर परतीत नहीं होती  हे प्रभु कभी कभी लगता है कि आप हमारे अन्तर मन में हों  तब कभी कभी लगता है कि आप कण कण में हों  तब कभी कभी लगता है कि दीन हीन लाचार अपाहिज मानव  पशु पंछी कि देखभाल करने में  हमें भूल गए हों  लेकिन यह सच है...

अमावस्या और पूर्णिमा

 तारों के धूमिल प़कास में आकाश पूर्णिमा का इंतजार कर रहा था उसी समय अमावस्या आईं सदा कि भाती मुस्कुराई बोले गले में बाहें डाल मेरे कारण तुम परेशान होते रहे  मेरे अंधेरे से तुम बदनाम हो गए इससे मेरी मानो अपनी पूर्णिमा के पास चलें जायौ पर आकाश ऐक शर्त है हमारी आकाश आश्चर्य में डूबा बोला क्या पूर्णिमा के मिलते ही ऐक बार मुझे बुलाना तथा कहना उससे कि अमावस्या ने पूर्णिमा तुमसे मिलने का प्रस्ताव भेजा है। एवं कहा है कि मैं तारों कि रानी अंधियारे कि दीवानी सदियों से बहिन तुम्हारे दर्शन को ललक रहीं  कहती थी कि ऐक बार ही सहीं ज्यादा नहीं छड़ भर को मिलवाना इस विरह के इतिहास में मिलन का ऐक छड़ लिख कर तुम और पूर्णिमा जहां चाहे चलें जाना।।

अल्हड़ प्रेमका के साथ होली कविता

 तेरे सांवले सलोने गाल उन पर लाल गुलाल। गुलाबी चेहरा उलझे बाल नजरे तेरी बनाती है जाल जाने क्यों आत्मा बेचारी लिए मन कि पिचकारी सदियों से देखें राह तुम्हारी मिलन के गीतों कि है वारी । लाज संकोच कर क्या जी सकोगे अनाड़ियों कि क्या परवाह करोगे यह परवाह वे आदर्श रोकेंगे मत करो प्यार रोज कहेंगे कैसे हृदय रूपी कडाव से गंगा सी भावनाओं के रंग से । भर मन कि पिचकारी से  न मिटने वाला रंग डालू कैसे भीड़ में तुम उसी में हम है रंग कि बोछार ज्यादा गुलाब कम हैं सरोवर हो रहा पूरा मौसम है मुस्कुराने का बज रहा सरगम है। क्यों कि चाहत कि पिचकारी भरी भावनाओं से भारी तू खड़ी अपनी अटारी पर निशाना बांधने में भारी बुद्धी भारी तुम अकेले कहा महफ़िल में खड़े हों तेरे जैसे चेहरे जहां रंगे हैं खोजती नजर जहां तुम जाती हो  तब वही पीछे खड़ा पाती हों  देखती प्यार के रंग में।भीगा बदन आपका है तन से लिपट गये कपड़े योवन तुम्हारा हैं । चाहत यही तुम सदा मुस्कुराते रहो  खूब होली खेलों जी भर कर गायो यह भावना से भरी पिचकारी खाली तब होंगी इंतजार मिटेगा तब  जब सामने आप होगी ।।

बंद कमरे का पाप कहानी

अंजलि आईने के सामने खड़ी होकर अपने रूप यौवन को देखकर इतरा रही थी माथे पर आई लटों को कभी इधर करती कभी उधर कभी भोहो पर छोटे से ब्रश से कोई क़ीम लगाती तब कभी औठो पर बदल बदल कर लिपस्टिक लगाती तब कभी अपने सीने को देखकर लजाती तब कभी अपनी कटील आंखों को देखकर इधर उधर घुमाती क्यों न हो वह किसी जलपरी जैसी ही तो थी पतली कमर सुराहीदार गर्दन गुलाबी-गुलाबी गुलाब कि पंखुड़ियों जैसे होंठ, सुतवा नाक चोड़ा माथा फिर गर्दन के नीचे कमर तक लटकते हुए नागिन जैसे बाल गोरी त्वचा लम्बी छरहरी देह जब वह घर से कालेज जाने को निकलती थी तब मुहल्ले के छिछोरे लड़के उसकि स्कूटी के पीछे मोटरसाइकिल दौड़ाते कोई उसे गुलाब का फूल देकर प्यार का इजहार करता तब कोई महंगा मोबाइल फोन दिलाने का कहता तब कोई शायरी गा कर उसे लुभाने का प्रयास करता किन्तु वह किसी को भी भाव नहीं देती थी कारण वह संस्कार वान लड़की थी लेकिन कुछ दिनों से वह  लम्बी महंगी कार पर सवार खुबसूरत नौजवान कि और  आकर्षक हों रही थी हालांकि वह उसे सही तरीके से जानती भी नहीं थी बस कभी कभी कालेज के पास वाली कुल्हड़ वाली चाय कि दुकान पर उसे देखकर अनदेखा कर देती थी ...

वो अल्हड़ निराली

 चाल निराली आली तोरी और निराली बोली तोरी कैश निराले फैलें कारे कारे चेहरे के चहुं ओर है सारे बने फिरत है धन सावन के। नयन निराले कजरारे से बड़े बड़े सीधे सादे से भोहो के धनुष बने से चलत फिरत है जब तिरछे से तीर बनें हैं और मदन के गाल निराले भरे भरे से मुस्कुराते जब गहरे गहरे से  गुस्सा में उषा बन जाते प्यार में ये संध्या बन जाते मन लुभावना है आपन के दांत निराले मुक्ता जैसे हंसते हैं जब धन बिजली से औठ लजीले लालामी लें आगंतुक कि सलामी ले सपने देखें चुप हों आवन के।।